मेरठ में बुधवार शाम निर्माणाधीन तीन मंजिला भवन के जमींदोज होने के बाद गाजियाबाद से गई एनडीआरएफ की टीम को मलबे में दबे एक युवक को निकालने में करीब तीन घंटे लगे। अगर टीम के पास ग्राउंड रेसक्यू रडार होता तो युवक को काफी कम वक्त में निकाला जा सकता था।
दरअसल, कनाडा निर्मित यह रडार मलबे में दबे लोगों का पता बहुत तेजी से लगा लेता है। एनडीआरएफ ने पिछले हफ्ते ही इस रडार का सफल ट्रायल कर मुख्यालय से अनुरोध किया था इसे आयात किया जाए।
एनडीआरएफ के कमांडेंट पीके श्रीवास्तव ने बृहस्पतिवार को बताया कि मेरठ में एनडीआरएफ के 42 जवानों की टीम ने कंक्रीट की चार लेयर के नीचे दबे मुनीश नामक युवक को बुधवार रात करीब एक बजे घायल अवस्था में बाहर निकाल लिया।
उन्होंने बताया कि भवनों के जमींदोज होने की घटना में एनडीआरएफ मुख्य रूप से लाइव डिटेक्टर और डॉग का सहारा लेती है। गोविंदपुरम स्थित एनडीआरएफ 8वीं बटालियन ने कनाडा निर्मित ग्राउंड रेस्क्यू रडार का यहां तीन बार ट्रायल किया। दूसरी और तीसरी ट्रायल में रडार को पास कर दिया गया।
कमांडेंट ने बताया कि उन्होंने इस रडार में कुछ और सुधार करने की सलाह दी है। उन्होंने कहा कि देश में ऐसे रडार की जरूरत है। इस रडार का वजन मात्र 6-7 किलो है। इसे अटैची में रखकर घटनास्थल पर ले जाया जा सकता है। रडार यह बता देता है कि मलबे में किस जगह आदमी दबा हुआ है।