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Ghaziabad News: प्रेम विवाह के 10 महीने बाद हत्या, पति और सास-ससुर को उम्रकैद

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प्रेम विवाह का अंत: पत्नी रिया जैन की हत्या में पति आकाश त्यागी को आजीवन कारावास - फोटो : shiv tripathi
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गाजियाबाद। प्रेम विवाह के महज 10 महीने बाद 21 वर्षीय रिया जैन की हत्या के मामले में अदालत ने उसके पति आकाश त्यागी, सास उषा त्यागी और ससुर सुरेश त्यागी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। विशेष न्यायाधीश एससी/एसटी की अदालत ने तीनों पर 36-36 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया है।
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अभियोजन पक्ष ने वारदात की बर्बरता और पहचान मिटाने की कोशिश का हवाला देते हुए दोषियों के लिए फांसी की सजा मांगी थी, लेकिन अदालत ने मामले को विरलतम में विरल की श्रेणी का नहीं माना।

दहेज की मांग का आरोप
अभियोजन पक्ष के अनुसार, इंदौर निवासी सुनीत कुमार जैन की बेटी रिया जैन और आकाश त्यागी साथ पढ़ते थे। सुनीत कुमार दिल्ली के एक स्टेडियम में सुरक्षा गार्ड की नौकरी करते थे। रिया और आकाश ने 15 मार्च 2021 को प्रेम विवाह किया था। आरोप था कि शादी के बाद ससुराल वाले दहेज से खुश नहीं थे और पांच लाख रुपये नकद के साथ एक कार की अतिरिक्त मांग कर रहे थे। इसी विवाद के बीच 25 जनवरी 2022 को रिया की हत्या कर दी गई। जिस रिश्ते को रिया जैन ने अपनी पसंद और भरोसे के साथ जिंदगी भर निभाने का सपना देखा था, वही रिश्ता शादी के महज दस महीने बाद उसकी जिंदगी का अंत बन गया।
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गन्ने के खेत में मिला था शव
अभियोजन के मुताबिक, घटना के दिन रिया के सास-ससुर उसे मुरादनगर थाना क्षेत्र के शहजादपुर गांव स्थित गन्ने के खेत में ले गए थे। आरोप है कि वहां नशीला पदार्थ पिलाने के बाद उसकी हत्या कर दी गई। पहचान छिपाने के लिए शव के साथ बर्बरता की गई। अभियोजन पक्ष ने अदालत में दलील दी कि रिया का सिर और दोनों हाथ कलाइयों से काटकर गंगनहर में फेंक दिए गए, जबकि शेष शव गन्ने के खेत में छोड़ दिया गया। वारदात के बाद अपहरण की कहानी गढ़कर मामले को छिपाने की कोशिश करने का आरोप भी लगाया गया।

पिता और मामा ने दर्ज कराया था मुकदमा
रिया के पिता सुनीत कुमार और मामा विपिन जैन ने ससुराल पक्ष के खिलाफ विजयनगर थाने में मुकदमा दर्ज कराया था। विवेचना पूरी होने के बाद पुलिस ने सिद्धार्थ विहार निवासी पति आकाश त्यागी, सास उषा त्यागी और ससुर सुरेश त्यागी के खिलाफ दहेज हत्या समेत अन्य गंभीर धाराओं में आरोपपत्र दाखिल किया। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने करीब 12 गवाह पेश किए।

अदालत ने आजीवन कारावास को माना उचित
अदालत ने फैसले में कहा कि अपराध की गंभीरता, क्रूरता या समाज पर उसके प्रभाव मात्र से मृत्युदंड का औचित्य स्वतः स्थापित नहीं हो जाता। मृत्युदंड पर विचार करते समय अपराध की परिस्थितियों के साथ दोषियों की व्यक्तिगत परिस्थितियों, उनके सुधार और पुनर्वास की संभावनाओं तथा अन्य गंभीरकारी और प्रशमनकारी परिस्थितियों का संतुलित आकलन जरूरी है। अदालत के अनुसार, मृत्युदंड तभी दिया जा सकता है, जब सभी प्रासंगिक परिस्थितियों पर विचार करने के बाद आजीवन कारावास का विकल्प पूरी तरह अनुपयुक्त पाया जाए। मामले पर विचार के बाद अदालत ने इसे विरलतम में विरल की श्रेणी का अपराध नहीं माना और तीनों दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
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