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सरकारी आंकड़े में छह महीने में एक बच्चे की मौत

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स्वास्थ्य विभाग का रेफर ट्रीटमेंट, दम तोड़ रहे शिशु
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गाजियाबाद। दिल्ली से सटे वीआईपी जिले (गाजियाबाद) में नवजात शिशुओं को उचित उपचार नहीं मिल पा रहा है। जिला महिला अस्पताल को छोड़ दिया जाए तो किसी सरकारी अस्पताल के पास एसएनसीयू (नवजात शिशुओं के लिए विशेष देखभाल यूनिट) की सुविधा नहीं है। आलम यह है कि प्रसव व उसके बाद जनमें शिशुओं को इलाज रेफर के नाम पर भटकाया जाता है। ऐसे में बीच रास्ते दम तोड़ने वाले शिशुओं का रिकॉर्ड में कोई उल्लेख नहीं होता। कारण एक सेंटर से रेफर दिखाया जाता है और दूसरा स्वास्थ्य केंद्र मौत होने पर उसे अपने रिकॉर्ड में भर्ती नहीं दिखाता है। यही कारण है कि सरकारी आंकड़ों के खेल में माहिर स्वास्थ्य विभाग ने बीते छह माह में उपचार के दौरान महज एक शिशु की मौत दिखाई है। जबकि धरातल पर सच्चाई आंकड़ों के विपरीत है।
सरकारी आंकड़ों में अप्रैल से दिसंबर तक जिले में 62977 बच्चे पैदा हुए। इनमें 32294 लड़केएवं 30683 लड़कियां की संख्या है। जबकि मौत सिर्फ एक नवजात शिशु की हुई। अब यहां पर आंकड़ों की बाजीगरी देखिए कि जिले के सभी स्वास्थ्य केंद्रों पर प्रसव के 70 हजार से अधिक मामले आए। अब करीब सात हजार से अधिक प्रसव के मामलों में मरीजों को उच्च चिकित्सा केंद्र (हायर सेंटर) के लिए रेफर कर दिया गया। सवाल उठता है कि उन सात हजार प्रसव के मामलों में कितने शिशुओं की जान बची। इसका आंकड़ा स्वास्थ्य विभाग के पास नहीं है, जबकि नियम के तहत आशाओं को अपने क्षेत्र की गर्भवती महिला से लेकर हर प्रसव की जानकारी स्वास्थ्य विभाग के सीसीटीएनएस पोर्टल पर अपलोड करनी होती है, जिससे की गर्भवती होते ही महिलाओं को व्यवस्थित डाइट और टीकाकरण मुहैया कराया जा सके, लेकिन यहां पर आलम यह है कि गर्भवती महिलाओं का ही स्वास्थ्य विभाग के पास सटीक और वास्तविक आंकड़ा नहीं है। यही कारण है कि आंकड़ों के खेल में स्वास्थ्य विभाग शिशुओं की मौत के मामले दफन कर जाता है।
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प्रसव पीड़ा में जच्चा-बच्चा की जान पर खतरा
आंकड़े बताते हैं कि जिले में चार सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, 26 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 70 न्यू पीएचसी संचालित हैं। न्यू पीएचसी शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में विशेष तौर पर गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं को उचित इलाज मुहैया कराने के उद्देश्य से खोली गई थीं, जिससे की जन्म के समय नवजात की मौत के मामलों में कमी लाई जा सके। अब पर्दे के पीछे की दूसरी तस्वीर यह है कि किसी भी स्वास्थ्य केंद्र पर बेहोशी का इंजेक्शन देने वाला विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं है, जिस कारण से सामान्य प्रसव के अतिरिक्त ऑपरेशन के मामलों में गर्भवती महिला को रेफर कर किनारा कर लिया जाता है। ऐसे में प्रसव पीड़ा के दौरान जच्चा और बच्चा दोनों की जान खतरे में रहती है।
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कोट
महिला अस्पताल में नवजात शिशुओं को भर्ती करने की व्यवस्था है। इसके अलावा संजय नगर एवं एमएमजी अस्पताल में भी बच्चे भर्ती किए जाते हैं। आईसीयू की व्यवस्था न होने से अति गंभीर बच्चों को रेफर करने के साथ ही उन्हें एंबुलेंस से हायर सेंटर में भर्ती कराया जाता है। अगर आंकड़े में कहीं दिक्कत है तो उसे जांच कर ठीक कराया जाएगा। - डा. एनके गुप्ता, सीएमओ
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