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दिमाग पर असर डाल रहा ऑनलाइन गेम, रात में चीख रहे बच्चे

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दिमाग में असर डाल रहा आनलाइन गेम, रात में चीख रहे बच्चे
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- दो महीने में 65 बच्चों की छूटी लत
माई सिटी रिपोर्टर
गाजियाबाद। ऑनलाइन गेमिंग और एप पर लाइव रहने की खुमारी नशे की लत में बदल रही है। ज्यादातर को इस बात की भनक ही नहीं लग पाती कि जिस गेम या एप को वे चला रहे हैं, उसकी दीवानगी उन्हें मानसिक रोगी बना चुकी है। यही हाल बच्चों के साथ ही वह दिन भर ऑनलाइन गेम खेलते हैं और रात में सोते समय उसी गेम को लेकर चिल्लाते हैं। इससे मां-बाप की नींद भी उड़ जाती है। संयुक्त अस्पताल स्थित साथिया केंद्र पर दो महीने में काउंसिलिंग के लिए आने वाले 65 बच्चों और किशोर में आनलाइन गेम की लत छूटी है।
ऐसे पहचानें बच्चों की लत
यदि बच्चे की दिनचर्या में बदलाव नजर आए। उसका पूरा कामकाज मोबाइल के इर्द-गिर्द ही दिखाई देने लगे तो समझिए वह आनलाइन गेम की गिरफ्त में जा रहा है। बच्चे का स्वभाव आक्रामक और गुस्सैल हो रहा है, आमतौर पर गुमसुम दिखाई देता है। उसकी याददाश्त में कमी आना बच्चे में ऑनलाइन गेम की लत लगने के संकेत हैं। काउंसिलिंग के बाद बच्चे की आदत में बदलाव होने से गेम की लत भी छोड़ रहे हैं।
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वास्तविक दुनिया से दूर हो जाते हैं बच्चे
सीनियर साइकोलॉजिस्ट डॉ. संजीव त्यागी बताते हैं कि ऑनलाइन गेम के अभ्यस्त बच्चों में कई तरह की मानसिक समस्या सामने आ रही है। कई बच्चे इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि गेम छोड़ने के नाम पर ही आक्रामक होने लगते हैं। लंबे समय तक एप गेम और ऑनलाइन गेम खेलने से साइकोसिस होने का भी खतरा रहता है। बच्चों का मन कोमल होता है इसलिए आसानी से गेम की दुनिया में जाते हैं। यही साइकोसिस बीमारी है, इसमें मरीज वास्तविक दुनिया से दूर हो जाता है। एडिक्शन के बाद बच्चों को रोकने पर वे आक्रामक भी हो सकते हैं। इसका असर उनकी पढ़ाई और जीवन पर सीधे पड़ता है।
इस तरह करें पहचान
बच्चा मैदान में खेलने के बजाए मोबाइल पर टाइम बिताना ज्यादा चाहता हो। लोगों के बीच बैठकर बात करते हुए भी कोई मोबाइल गेम पर लगा रहता हो। अगर कोई हर वक्त मोबाइल के गेम में लगा रहता है तो ये सबसे पहली पहचान है। मोबाइल ले लेने पर बच्चा या वयस्क आक्रामक हो जाता हो।
डांटने के बजाय प्यार से समझाएं
मनोचिकित्सक डॉ. हेमिका अग्रवाल का कहना है कि बच्चों को डांटने के बजाय उन्हें प्यार से समझाएं। अब कोरोना संक्रमण कम है, इसलिए उन्हें मैदान में खेलने के लिए भेजें। बहुत कम मामलों में इलाज की जरूरत पड़ती है। काउंसिलिंग के बाद बच्चे जल्दी आदत छोड़ देते हैं।
केस -1
आया आदत में बदलाव
डॉ. संजीव ने बताया कि शनिवार को एक ऐसा मामला आया था जिसमें मेरठ रोड स्थित एक अच्छे स्कूल में पढ़ने वाले 7वीं के छात्र ने अपनी बड़ी बहन को इसलिए स्क्रू ड्राइवर से मारा कि उसने छात्र से मोबाइल छीन लिया था। उसे गहरी चोट आई। बच्चे के माता पिता ने बताया की वो उसे बचपन में मोबाइल से खेलने देते थे ताकि वो एक जगह आराम से बैठा रहे। उन्हें पता नहीं चला कि उनका बेटा कब एप गेम का एडिक्ट हो गया। काउंसिलिंग के बाद बच्चे की आदत में बदलाव है।
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केस - 2
अब स्वस्थ है
इंदिरापुरम के पब्लिक स्कूल में पढ़ने वाले वसुंधरा निवासी छात्र 10वीं में 90 प्रतिशत अंक से पास हुआ था। 12वीं तक आते-आते उसका पास करना भी मुश्किल हो गया। स्कूल शिक्षिका ने उसकी मां को बताया कि छात्र कई बार क्लास में ऑनलाइन गेम खेलता हुआ पकड़ा गया है। काउंसलिंग में मां-बाप ने काउसंलर को बताया कि वह घर पर केवल गेम खेलता था। मना करने पर घर वालों से लड़ाई कर लेता और घर छोड़ देने की धमकी देता था। काउंसिलिंग के बाद बच्चा अब स्वस्थ है।
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