मरीजों की देखभाल के लिए अस्पताल को ही बनाया घर
गाजियाबाद। नर्स, सिस्टर, उपचारिका और कभी दीदी, इन्हीं नामों से पुकारते हैं हम उन्हें। जब हम अस्पताल में होते हैं तो हमारे दवा से लेकर खाना खाने तक का ख्याल यही रखती हैं। हम दवा भले डॉक्टर से लेते हें लेकिन उपचार हमारा एक नर्स ही करती है। जब मरीज बहुत परेशान होता है तो कभी मां बनकर तो कभी बहन बनकर समझाती है। अगर मरीज परेशान करता है और नहीं सुनता तो बहुत गुस्सा भी करती है। ऐसे में जहां पूरा विश्व एक महामारी की चपेट में हैं ऐसे में नर्सों की जिम्मेदारी और भी बढ़ गई है। वे दिन-रात भूलकर मरीजों की सेवा में लगी हुई हैं। ऐसे में कई नर्सें ऐसी हैं, जो गर्भवती हैं फिर भी कोराना मरीजों का ख्याल रख रही है तो कोई ऐसा है, जिसने दो महीने से अपनी बच्ची को गोद में नहीं उठाया। इस दौरान बीमार और संक्रमित मरीजों की देखभाल में लगीं 35 नर्स अब तक संक्रमित हो चुकी हैं। हर वर्ष 12 मई को अंतरराष्ट्रीय नर्स दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस बार विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भविष्य की सेवा के लिए दृष्टि थीम रखी है। पेश है कोविड मरीजों की देखभाल में लगी नर्सों से बातचीत।
मरीजों को न हो परेशानी, रात को भी नहीं जाती घर
मैं पिछले 28 वर्ष से सिर्फ मरीजों के बचाव के लिए काम कर रही हूं, लेकिन पहली बार ऐसा हो रहा है कि मरीजों का जीवन बचाने के लिए स्वयं को भी बचाने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है। मुझे अपने घर केरल जाना था। उससे पहले भाई के साथ तीन अप्रैल को मुंबई जाना था लेकिन इसी दौरान मरीजों की संख्या बढ़ने लगी तो मैंने दोनों जगह जाने का कार्यक्रम निरस्त कर दिया। अस्पताल संचालक डॉ. बीपी त्यागी ने मुझे शाम को सात बजे से पहले की तरह छुट्टी दे रखी है, लेकिन पिछले डेढ़ महीने से घर नहीं जाती हूं। क्योंकि जिस मरीज की पूरे दिन देखभाल करती हूं, उसे रात में कोई परेशानी हुई तो पूरे दिन की मेहनत बेकार जाएगी इसलिए जब भी मरीजों को जरूरत होती है रात में भी देखभाल करती हूं। इसलिए अस्पताल में ही रात को सोती हूं। - मिनी, नर्स हर्ष ईएनटी अस्पताल
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दो महीने से बच्ची को नहीं लिया गोद में
मैं संयुक्त अस्पताल कोविड लेवल-2 में कार्यरत हूं। इस समय ज्यादातर गंभीर मरीज भर्ती हो रहे हैं। उनकी देखभाल में पूरा समय निकल जाता है। सबसे अधिक परेशानी हो रही है कि पीपीई किट पहनने के 15 से बीस मिनट बाद ही पूरा शरीर पसीने से तरबतर हो जाता है। ऐसे में एक दिन में 50 से 60 मरीजों को इंजेक्शन लगाना, उनका ऑक्सीजन सेचुरेशन, बुखार जांच करना और दवाई देना बड़ी चुनौती बना हुआ है। ड्यूटी से घर पहुंचने पर ऐसी स्थिति नहीं रहती है कि खाना बना सकें। पति ही खाना बना रहे हैं। पिछले दो महीने से अपनी पांच साल की बेटी को गोद में नहीं लिया है। कई बार रोना भी आता है लेकिन मन को तसल्ली मिलती है कि मेरी देखभाल से मरीज स्वस्थ हो रहे हैं तो इससे ईश्वर की पूजा भी हो रही है। - मनीषा यादव, कोविड अस्पताल लेवल-2 संजय नगर
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15 मई है प्रसव का समय, लगातार कर रही हूं टीकाकरण
मैं जिला एमएमजी अस्पताल में 16 जनवरी से टीकाकरण कर रही हूं। मेरे गर्भ का समय नौ महीने पूरे हो चुके हैं। डॉक्टरों ने 15 मई का समय दिया है। इसके बावजूद अभी तक सिर्फ इसलिए टीकाकरण कर रही हूं कि आज हर कोई कोरोना संक्रमण के भय से परेशान है। अगर मेरे काम से किसी का भला होता है तो उससे मन को बड़ा संतोष मिलता है। हर समय संक्रमण का भय बना रहता है लेकिन टीकाकरण करने के बाद जब घर जाती हूं तो बहुत ही मानसिक सुकून मिलता है। पिछली साल भी इस तरह की आपदा आई थी, लेकिन इतनी भयावह स्थिति नहीं थी। इसलिए लगातार काम कर रही हूं। इसमें परिवार का भी सहयोग रहता है। - पूजा केसरवानी, जिला एमएमजी अस्पताल