फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अफसरों पर आंच तो लंबी खिंचेगी जांच

विज्ञापन
विज्ञापन
अफसरों पर आंच तो लंबी खिंचेगी जांच
विज्ञापन

गाजियाबाद। जीडीए की स्वर्णजयंतीपुरम योजना में की गई धांधली के मामले में जिम्मेदार अफसरों पर कार्रवाई न होने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नाराजगी यों ही नहीं जाहिर की। भूखंड आवंटन में 19 साल पहले की गई इस 400 करोड़ की धांधली में 36 अधिकारियों और कर्मचारियों के फंसे होने के बावजूद अब तक किसी का बाल बांका नहीं हुआ है। मुरादाबाद मंडल के आयुक्त जांच कर चुके हैं। अब नए सिरे से मेरठ मंडल के आयुक्त कर रहे हैं। नई जांच की भी कोई समय-सीमा तय नहीं की गई है। लेकिन यह इस तरह का अकेला केस नहीं है। जब भी अफसरों पर आंच आई है, जांच लंबी ही खिंची है।
स्वर्णजयंतीपुरम योजना में की गई धांधली की शिकायत 2011 में की गई। हाईकोर्ट के आदेश पर जांच शुरू हुई 2017 में। रिपोर्ट 2019 में आई, लेकिन कार्रवाई 2022 के आधा बीत जाने के बाद भी नहीं की गई है। इस मामले के मुख्य शिकायतकर्ता भाजपा पार्षद राजेंद्र त्यागी का कहना है कि जीडीए के अधिकारी डीपी सिंह, हीरालाल, आरपी पांडेय, आरसी मिश्रा सहित कर्मचारियों को बचाने के लिए बड़ा खेल किया गया है।
विज्ञापन

हाईकोर्ट ने दोषियों पर एफआईआर के आदेश दिए थे लेकिन मुरादाबाद मंडल के आयुक्त ने जांच को भूखंड आवंटन की जगह अवैध निर्माण की ओर मोड़ दिया। ऐसे में मुख्यमंत्री और प्रमुख सचिव आवास को पत्र लिखकर सही दिशा में जांच पर कार्रवाई की मांग की गई है।
सीबीआई को जा सकती है जांच
हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार से पूछा है कि क्यों न इस धांधली की जांच सीबीआई को सौंप दी जाए? इस पर सरकार ने अपना पक्ष रखने के लिए मोहलत मांगी है। अगली सुनवाई 14 जुलाई को होनी है। अगर हाईकोर्ट सरकार के पक्ष से संतुष्ट नहीं हुआ तो जांच सीबीआई को सौंपी जा सकती है। जीडीए ने 1998 से 2003 के बीच स्वर्णजयंतीपुरम आवासीय योजना के तहत 1583 भूखंडों की 10 से ज्यादा योजनाओं को लांच किया था। आवंटन के बाद निर्धारित राशि जमा न करने या फिर भूखंड सरेंडर करने के कारण कई लोगों के आवंटन निरस्त कर दिए गए। निरस्त हुए 139 भूखंडों को नियमों को ताक पर रखकर फरवरी 2005 से फरवरी 2007 के बीच फिर से आवंटित कर दिया गया। दूसरी बार में चहेते और परिचितों को आवंटित किए गए।
मुआवजा घोटाले में नहीं खोले अफसरों के नाम
22 करोड़ के मुआवजा घोटाले में राजस्व विभाग के अफसरों के खिलाफ भी केस दर्ज है लेकिन इनके नाम नहीं खोले गए हैं। जांच में एडीएम दफ्तर की भूमिका सवालों के घेरे में मिली है, लेकिन कार्रवाई नहीं की गई है। यह घोटाला फर्जी समिति बनाकर किया गया था। समिति ने दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेस वे के लिए अधिग्रहण में गई जमीन का मुआवजा लिया था।
डीएम की सेवानिवृत्ति के बाद पूरी हुई जांच
दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे के लिए अधिग्रहीत की गई जमीन का कई गुना मुआवजा देने के मामले में शासन ने कुछ दिन पहले कार्रवाई की है। यह घोटाला 2017 से पहले किया गया। उस दौरान तैनात रहे डीएम विमल कुमार शर्मा और निधि केसरवानी जांच में दोषी मिले। निधि को निलंबित किया गया। जांच के दौरान ही विमल सेवानिवृत्त हो गए।
जीडीए के अफसरों पर दर्ज हो चुके दस केस
रेड एपल की 200 करोड़ की धोखाधड़ी के मामले में जीडीए के अफसरों पर दस केस दर्ज हो गए हैं। इनके नाम नहीं खोले गए हैं। अब तक दर्ज 100 केस में 90 में बैंकों के अफसर की भूमिका भी संदिग्ध बताई गई है, लेकिन इनके भी नाम पुलिस ने नहीं खोले हैं। इसकी जांच आर्थिक अपराध शाखा ( ईओडब्ल्यू ) को देने की सिफारिश की गई है।
विज्ञापन

जांच में देरी होना गलत
किसी भी मामले में जांच में इस वजह से देरी नहीं होनी चाहिए क्योंकि उसमें अधिकारी फंसा है। आरोप चाहें कर्मचारी पर हो या अधिकारी पर या किसी अन्य पर, जांच की प्रक्त्रिस्या एक जैसी होनी चाहिए। जैसे आम आदमी के खिलाफ आरोप लगने पर तुरंत कार्रवाई होती है, वैसे ही अन्य मामलों में हो। सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के खिलाफ जांच की प्रक्रिया तय है, इसका पालन होना चाहिए और इसमें देरी नहीं की जानी चाहिए।
- चक्रपाणी यादव सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें