छुट्टी में खेलते नहीं, मोबाइल के लिए उग्र हो रहे बच्चे
गाजियाबाद। स्कूलों में गर्मी की छुट्टी होने के बाद पढ़ाई बंद होने से बच्चों में फिर मोबाइल की लत बढ़ गई है। यही स्थिति लॉकडाउन के समय हुई थी। स्थिति यह है कि बच्चे ग्रुप बनाकर आठ से दस घंटे तक लगातार मोबाइल पर गेम खेल रहे हैं। इस कारण से मानसिक रोगी होने के साथ ही आंखों की रोशनी कम होने और ब्रेन ट्यूमर होने का खतरा बन जाता है। एमएमजी अस्पताल के साइकोलॉजी विभाग में रोजाना पांच से सात मामले इस तरह के आ रहे हैं, जिसमें मां-बाप बच्चे की आदत छुड़ाना चाहते हैं। निजी साइकोलॉजिस्ट के पास इस तरह के बच्चों की संख्या अधिक है।
किसी भी तरह की लत मनोरोग
मनोचिकित्सक डॉ. एके विश्वकर्मा का कहना है है कि कोई भी लत एक मनोरोग है। शराब को तो सामाजिक बुराई मानते हैं, लेकिन मोबाइल पर गेम खेलने या अन्य लत को शौक समझते हैं। मोबाइल की लत शराब से भी ज्यादा खतरनाक है। फिर उस लत को छुड़ाने के लिए काउंसिलिंग की जरूरत पड़ती है।
बचपन से ही पड़ रही है लत
एमएमजी अस्पताल के मनोचिकित्सक डॉ. साकेतनाथ तिवारी का कहना है कि बच्चे बचपन में ही मोबाइल के आदी हो रहे हैं। यह लत भी इतनी बढ़ जाती है कि मोबाइल न मिलने पर वे जान लेने या देने पर आ जाते हैं। इसके लिए मां-बाप का बच्चों को समय न देना मुख्य कारण बन रहा है। कई बार बच्चों को शांत कराने के लिए अभिभावक मोबाइल पकड़ा देते हैं और जब तक उनकी समझ में आता है कि बच्चा मोबाइल का आदी हो गया है, तब तक देर हो चुकी होती है।
माता-पिता की गलती
साइकोलॉजिस्ट डॉ. संजीव त्यागी ने बताया कि हर दिन दो या तीन मरीज मोबाइल व इंटरनेट की लत वाले आ रहे हैं। इनमें ज्यादातर 12 से 19 साल की उम्र के बच्चे हैं। कम उम्र में ही बच्चों को मोबाइल थमाने के कारण ऐसा होता है। इसमें बड़ी गलती माता- पिता की है। बच्चा मोबाइल छुड़ाते ही चिल्लाना और रोना शुरू कर देता है। कुछ को नो मोबाइल फोबिया हो गया है। वह बिना मोबाइल एक मिनट भी नहीं रह सकते।
केस 1. आत्महत्या की कोशिश
शहर के नामी स्कूल में पढ़ने वाले 14 साल के एक बच्चे को मोबाइल पर गेम खेलने की आदत लग गई। लत ऐसी कि वह सात दिन-रात सोया ही नहीं। कान में सीटी बजने की आवाज आने लगी। आंखों के सामने तरह-तरह की डिजाइन दिखने लगी। काउंसिलिंग में पता चला चला कि बच्चे सर्किल बनाकर यह गेम खेलते हैं। बच्चे ने स्कूल जाना छोड़ दिया था। मां ने मोबाइल छीनने की कोशिश की तो हाथ में ब्लेड मार लिया था।
केस 2. नौ साल का बच्चा आठ घंटे गेम खेलता है
राजनगर निवासी नौ साल के एक बच्चे के पिता बाहर रहते हैं, मां गृहणी हैं। आठ साल की उम्र में उसे मोबाइल पर गेम खेलने की लत लग गई। अब हालत यह है कि बच्चा दिन - रात में आठ घंटे मोबाइल पर गेम खेल रहा है। मोबाइल मांगों तो घर में तोड़फोड़ शुरू कर देता है। परिजन उसे संयुक्त अस्पताल में काउंसिलिंग के लिए ले गए तो वहां पर काउंसलर मुकेश यादव से बच्चे ने बताया कि उसे नींद नहीं आती।
इस तरह हो रहा बुरा असर
कई बार माता- पिता में से एक पक्ष बच्चे को मोबाइल देने के पक्ष में रहता है, जिससे दोनों में विवाद होता है।
आंखों को नुकसान पहुंच रहा। रेडिएशन से ब्रेन ट्यूमर समेत कई बीमारियों का खतरा।
नींद नहीं होने से बच्चे डिप्रेशन में जा रहे हैं, जिससे वह आत्मघाती कदम उठा रहे हैं।
वह अपनी पढ़ाई पर फोकस नहीं कर पा रहे। कुछ ने स्कूल जाना छोड़ दिया।
नहाने से लेकर कई नियमित क्रियाएं प्रभावित हो रही हैं।
माता- पिता यह करें
उग्र होकर बच्चे से मोबाइल न छीनें। किसी मनोचिकित्सक को दिखाएं।
कोशिश करें कि बच्चा स्कूल जरूर जाए, जिससे उसकी लत कुछ कम होगी।
बच्चों के सामने मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल न करें और न ही उन्हें खेलने के लिए दें।