गाजियाबाद। भक्ति जब निष्काम हो तो भगवान केवल मंदिर में विराजमान आराध्य नहीं रहते, बल्कि जीवन का हिस्सा बन जाते हैं। गाजियाबाद में कृष्ण भक्ति का ऐसा ही रंग देखने को मिलता है। नेहरूनगर और ब्रिज विहार की रहने वाली दो श्रद्धालुओं के लिए कान्हा जी आराध्य से कहीं बढ़कर परिवार के सबसे दुलारे सदस्य हैं। कोई पांच दशक से अपने हाथों से उनके वस्त्र बुन रही हैं तो कोई दो दशक से जन्माष्टमी पर बाल कृष्ण की लीलाओं को झांकियों में जीवंत कर रही हैं। उनकी दिनचर्या कान्हा की सेवा से शुरू होती है और उन्हीं की भक्ति में समाप्त होती है।
50 साल से हाथों से तैयार कर रहीं कान्हा की पोशाक
नेहरूनगर निवासी सुषमा व्यास बीते 50 वर्षों से कान्हा जी की अनवरत सेवा कर रही हैं। उनके दिन की शुरुआत कान्हा की सेवा और पूजा से होती है। सुबह-शाम आरती के साथ वह उनके भोग के लिए अलग-अलग व्यंजन तैयार करती हैं। कान्हा की पोशाक के लिए भी वह बाजार पर निर्भर नहीं हैं। कभी-कभार ही बाजार से पोशाक खरीदती हैं, जबकि ज्यादातर वस्त्र खुद तैयार करती हैं। सर्दियों में ऊन के और गर्मियों में सूती कपड़ों की पोशाक अपने हाथों से बनाती हैं। मौसम के मुताबिक कान्हा के वस्त्र बदलने के साथ रोजाना ताजे फूलों से उनका शृंगार भी करती हैं। इसके लिए उन्होंने घर की छत पर ही बागवानी कर रखी है। यहां रंग-बिरंगे फूलों के पौधे लगाए हैं, जिनसे रोज कान्हा का शृंगार किया जाता है।
20 साल से जन्माष्टमी पर सज रहा कान्हा का दरबार
ब्रिज विहार निवासी पूनम माथुर पिछले 20 वर्षों से लड्डू गोपाल की सेवा में समर्पित हैं। उनके घर में जन्माष्टमी किसी बड़े उत्सव से कम नहीं होती। हर साल घर में भव्य फूल बंगला सजाया जाता है और भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं पर आधारित झांकियां तैयार की जाती हैं। इन झांकियों को तैयार करने में परिवार के सभी सदस्य जुटते हैं। बच्चे, पोते और पोतियां भी उत्साह के साथ तैयारियों में हाथ बंटाते हैं। जन्माष्टमी के दिन घर पर भंडारा भी आयोजित किया जाता है, जिसमें सैकड़ों लोग प्रसाद ग्रहण करते हैं। पूनम के लिए यह आयोजन केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि कान्हा के प्रति परिवार की सामूहिक भक्ति का उत्सव बन चुका है।
सुषमा व्यास