आम आदमी को एक बाइक खरीदने से पहले भी सोचना पड़ता है। महीनों की कमाई एक बाइक खरीदने में लग जाती है। दूसरी तरफ, गाजियाबाद समेत प्रदेशभर के थानों में करोड़ों रुपये कीमत की बाइकें, कारें और भारी वाहन थानों में सड़ रहे हैं। प्रदेश में लंबित वाहनों की संख्या 30 हजार से ज्यादा है।
इनमें 4812 लावारिस वाहन हैं, जबकि 26396 केस प्रॉपर्टी के वाहन हैं। लावारिस वाहनों में लखनऊ पहले (881 वाहन) और गाजियाबाद पांचवें नंबर पर (304 वाहन) है। केस प्रॉपर्टी के वाहनों में भी लखनऊ पहले नंबर पर (2135 वाहन) है, गाजियाबाद दूसरे नंबर पर (2035) है। थानों में लावारिस वाहन बढ़ते जा रहे हैं और परिसर सिकुड़ते जा रहे हैं।
इन वाहनों को डिस्पोजल करने या इनके वारिसों को ढूंढने में पुलिस लापरवाही बरतती है, नतीजतन थानों में खड़े वाहन हजारों वाहन खराब हो जाते हैं। इससे राजस्व की भी हानि होती है। इनकी देखरेख करने वाला कोई नहीं है, जिस कारण इनके पार्टस भी गायब हो रहे हैं। कुछ वाहन तो ऐसे हैं, जिन्हें पहचानना भी कठिन हो गया है।
पुलिस के पास चेचिस या इंजन नंबर के आधार पर मालिकों का पता लगाने की ‘फुर्सत’ नहीं है, जबकि आरटीओ के सहयोग से वाहनों के रजिस्ट्रेशन, चेसिस और इंजन नंबर को नेशनल सॉफ्टवेयर में डालकर उनके वाहन स्वामियों को ढूंढा जा सकता है।
धारणा है कि पुलिसकर्मियों के वाहनों के पार्ट्स की जरूरत होती है तो वे खरीदते नहीं, बल्कि उन्हीं वाहनों से निकलवा लेते हैं। नीलामी की प्रक्रिया इतनी लंबी और जटिल है कि पुलिस थाना कबाड़ी की दुकान जाता है। ये वाहन अंत में कबाड़ी ही लेकर जाते हैं।
थानों में जब्त या लावारिस वाहनों के प्रकरण न्यायालय में प्रस्तुत किए जाते हैं। न्यायालय से अनुमति मिलने पर मजिस्ट्रेट, आरटीओ और सीओ नीलामी कराते हैं। केस प्रॉपर्टी केवाहन केस खत्म होने के बाद वाहन मालिकों को सौंप दिए जाते हैं। इस संबंध में एसएसपी केएस इमेनुएल का कहना है कि थानों में पड़े लावारिस वाहनों के लिए समय-समय पर नीलामी होती है, जल्द ही निलामी प्रक्रिया फिर की जाएगी।
लखनऊ और गाजियाबाद के अलावा बाकी जिलों में भी हजारों लावारिस और केस प्रॉपर्टी के वाहन सड़ रहे हैं। इनमें अलीगढ़, बुलंदशहर, इलाहाबाद, झांसी, आगरा, मुरादाबाद, कानपुर नगर सुल्तानपुर, रायबरेली, सीतापुर, उन्नाव, अमेठी, गोंडा, बलरामपुर, बहराइच, बस्ती, सिद्धार्थ, मथुरा, फिरोजाबाद आदि शामिल हैं।