पटाखा फैक्ट्री में हुए धमाके ने प्रशासन के तमाम दावों की पोल खोल दी। न तो फैक्ट्री में अग्निशमन के पुख्ता इंतजाम थे और न ही मजदूरों को फायर उपकरण चलाने की ट्रेनिंग दी गई थी। मानकों को ताक पर रखकर फैक्ट्री चल रही थी। धमाका इतना जबरदस्त था कि करीब डेढ़ से दो किलोमीटर दूर बने मकानों में रहने वाले लोग भी दहल उठे।
अब प्रशासन का दावा है कि हादसे के कारणों की जांच के बाद फैक्ट्री मालिक के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।सुबह करीब साढ़े सात बजे हुए धमाके से फैक्ट्री के छत की टीन करीब 20 फीट ऊपर पेड़ पर जाकर टंग गई। मजदूर इमरान, उमेश समेत महिला और एक अन्य मजदूर बाहर भागते वक्त आग की चपेट में आ गए और धमाके से गिरी दीवार के नीचे दब गए।
गनीमत रही कि आसपास कोई और पटाखा फैक्ट्री नहीं थी, वरना हादसा और बड़ा हो सकता था। इमरान समेत बाकी मजदूर करीब 15 मिनट मलबे में दबे रहे। मगर भीषण आग के चलते लोग उन्हें बाहर नहीं निकाल सके। बाद में उन्हें निकालकर अस्पताल पहुंचाया गया, जहां इमरान की मौत हो गई।
फैक्ट्री में अगिभनशमन इंतजाम के नाम पर छह फायर सिलेंडर तो थे, मगर मजदूर उन्हें चलाना तक नहीं जानते थे। छह सिलेंडर एक्सपायरी डेट के थे, जो किसी काम के नहीं थे। हालांकि एसडीएम हनुमान प्रसाद का कहना है कि कुछ समय पहले सभी फैक्ट्रियों की चेकिंग की गई थी। सभी में अगिभनशमन के इंतजाम भी थे।
अब जांच की जा रही है कि कैसे यहां एक्सपायरी सिलेंडर पहुंचे। जहां एसडीएम का दावा था कि फैक्ट्री में 8-10 किलो ही बारूद था वहीं, लोगों का कहना था कि 100-150 किलो तक बारूद स्टोर कर लिया गया था।
हादसे के बाद लगातार गांव के लोग दमकल विभाग को सूचना देते रहे मगर करीब पौने घंटे बाद दमकल की गाड़ी मौके पर पहुंची। इस दौरान लोग सभी घायलों को पुलिस के साथ मिलकर अस्पताल पहुंचा चुके थे।
लोगों का कहना है कि अधिकारियों ने कहा था कि दिवाली के सीजन के दौरान एक फायर ब्रिगेड वहीं तैनात रहेगी मगर प्रशासन का यह दावा भी खोखला निकला। हालांकि सीएफओ अक्षय रंजन ने बताया कि लोनी में कई आग की सूचनाओं के चलते फायर ब्रिगेड को शहर के बीच तैनात किया गया था।
खेतों के बीच बनी फैक्ट्री तक पहुंचने में गाड़ी को कुछ देर हुई। आसपास रहने वाले लोगों का कहना है कि हादसे के बाद पुलिस-प्रशासन मामले की लीपापोती में लगा है। लोगों का यह भी दावा है कि फैक्ट्री में 8-10 लोग थे। हादसे को छोटा दिखाने के लिए उन्हें छिपा कर भगा दिया गया।
इसे इत्तेफाक कहा जाए या लापरवाही मगर पिछले साल भी धनतेरस के दिन ही फर्रुखनगर की एक पटाखा फैक्ट्री में धमाके के साथ आग लग गई थी। इस आग में किसी की जान तो नहीं गई थी मगर लाखों रुपये के माल का नुकसान हुआ था। पिछले तीन साल में करीब आधा दर्जन हादसों के बाद भी प्रशासन ने सबक नहीं लिया है।
पटाखे बनाने के लिए फास्फोरस, मिट्टी और वोरा नाम के तीन पदार्थ का उपयोग होता है। काला फास्फोरस बेहद ज्वलनशील होता है। इसकी मात्रा में जरा सी चूक होने पर भी हादसे का खतरा रहता है। ज्यादातर हादसे फास्फोरस की मात्रा अधिक होने पर होते हैं। फर्रुखनगर की ज्यादातर फैक्ट्रियां लघु उद्योग हैं, जहां हाथ से काम होता है।
यहां वोरा की सही मात्रा का पता ही कारीगरों को नहीं होता है। सिर्फ अंदाजे से काम होता है, जिसके चलते अक्सर अधिक बारूद डल जाता है, जो चिंगारी मिलते ही आग पकड़ लेता है। यह कारीगर भी अप्रशिक्षित होते हैं, जिनमें महिलाएं भी शामिल होती हैं।
श्रम अधिनियम के तहत मिलने वाली कोई सुविधा इन्हें नहीं मिलती। बीमा न होने के कारण हादसा होने पर इन्हें कोई लाभ नहीं मिल पाता।