गाजियाबाद। जिले में आग से झुलसने वाले मरीजों के इलाज की सरकारी व्यवस्था गंभीर सवालों के घेरे में है। एमएमजी अस्पताल में स्थापित बर्न यूनिट पूरी तरह सक्रिय नहीं हो पाई है। इसके चलते गंभीर मरीजों को प्राथमिक उपचार के बाद दिल्ली रेफर करना पड़ रहा है। इससे कई बार रास्ते में ही मरीजों की हालत बिगड़ जाती है। कुछ मामलों में जान तक जा चुकी है।
हाल ही में सुदामापुरी में आग लगने की घटना के बाद झुलसे कई मरीजों को एमएमजी अस्पताल लाया गया, लेकिन उनकी गंभीर स्थिति को देखते हुए तत्काल रेफर कर दिया गया। अस्पताल प्रशासन के अनुसार केवल हल्के रूप से झुलसे मरीजों को ही भर्ती किया जाता है। गंभीर मामलों के लिए आवश्यक विशेषज्ञ सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।
2007 से अधूरी पड़ी व्यवस्था
अस्पताल में वर्ष 2007 में बर्न यूनिट की स्थापना की गई थी। स्टाफ और विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी के कारण यह यूनिट लंबे समय तक निष्क्रिय रही। करीब दो वर्ष पहले इसे फिर से शुरू किया गया, लेकिन हालात में खास सुधार नहीं हो पाया। वर्तमान में यूनिट केवल सामान्य वार्ड की तरह संचालित हो रही है और बर्न उपचार के लिए जरूरी आधुनिक सुविधाएं विकसित नहीं हो सकी हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, गंभीर रूप से झुलसे मरीजों के इलाज के लिए प्रशिक्षित डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ, आईसीयू सुविधा, संक्रमण नियंत्रण प्रणाली, ड्रेसिंग यूनिट और ऑपरेशन थिएटर जैसी व्यवस्थाएं जरूरी होती हैं। एमएमजी अस्पताल में इन संसाधनों की कमी बनी हुई है।
45 लाख आबादी के लिए चिंता
जिले की करीब 45 लाख की आबादी के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से समय-समय पर सुविधाएं बढ़ाने के दावे किए जाते हैं, लेकिन बर्न यूनिट को मजबूत करने की दिशा में ठोस प्रगति नहीं दिख रही है। वर्ष 2007 के बाद से इस यूनिट के विस्तार या आधुनिकीकरण पर कोई बड़ा कदम नहीं उठाया गया है।
मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. राकेश कुमार का कहना है कि यूनिट का संचालन किया जा रहा है। गंभीर मरीजों को बेहतर इलाज के लिए रेफर करना पड़ता है। उन्होंने बताया कि विशेषज्ञ डॉक्टरों और स्टाफ की नियुक्ति के लिए उच्च अधिकारियों को कई बार पत्र भेजा जा चुका है, लेकिन अभी तक पर्याप्त नियुक्तियां नहीं हो सकी हैं।