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Ghaziabad News: बबीता ने हौसले की स्याही से लिखी आत्मनिर्भरता की कहानी, पीएम ने दुनिया को सुनाई

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नंदग्राम में दुकान चलाती बबीता शर्मा। संवाद
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गाजियाबाद। जिंदगी की जंग में अपने दूर हुए, तब नंदग्राम की बबीता के पास दो ही रास्ते थे...हालात के आगे हार मान लेना या फिर खुद अपने पैरों पर खड़ा होना। बबीता ने दूसरा रास्ता चुना। संघर्षों के बीच उन्होंने प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना से मिले 10 हजार रुपये के सहारे पूजा सामग्री की छोटी-सी दुकान शुरू की और धीरे-धीरे अपने जीवन की तस्वीर बदल दी। आज वह न सिर्फ 40-50 हजार रुपये महीने कमा रही हैं, बल्कि करीब 100 लोगों को स्वनिधि योजना का लाभ दिलाकर उनके लिए भी उम्मीद की राह खोल चुकी हैं।
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बबीता के इसी संघर्ष और आत्मनिर्भरता की कहानी रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ में सुनाई। प्रधानमंत्री ने उन्हें महिला सशक्तीकरण और प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना की प्रेरक मिसाल बताया। अपनी कहानी प्रधानमंत्री के मुंह से सुनकर बबीता की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
बबीता बताती हैं कि वह अपनी दुकान पर थीं, तभी कुछ लोग आए और उन्हें बताया कि प्रधानमंत्री ने मन की बात में उनका जिक्र किया है। कुछ पल के लिए उन्हें यकीन ही नहीं हुआ कि जिस संघर्ष को उन्होंने चुपचाप जिया, वह देश के प्रधानमंत्री तक पहुंच चुका है।
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जिलाधिकारी रविंद्र मांदड़ ने बताया कि बबीता की कहानी हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत है। केंद्र और राज्य की योजनाओं से लोगों के जीवन में बदलाव लाने का प्रयास किया जा रहा है।
हौसले ने दिया साथ
बबीता की शादी फरीदाबाद के बल्लभगढ़ में हुई थी, लेकिन उनका वैवाहिक जीवन संघर्षों से भरा रहा। घरेलू हिंसा ने उनकी मुश्किलें बढ़ा दीं। हालात इतने बिगड़े कि पिता उन्हें वापस गाजियाबाद ले आए। पति पहले ही तीन बच्चों के साथ उन्हें छोड़ चुका था। इसके बाद बच्चों की जिम्मेदारी और घर चलाने की चुनौती अकेले बबीता के कंधों पर आ गई।
मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं। कोरोनाकाल के दौरान लॉकडाउन में उनका छोटा कारोबार बंद हो गया, लेकिन बबीता ने परिस्थितियों के आगे घुटने नहीं टेके। वर्ष 2022 में किसी ने उन्हें प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना के बारे में जानकारी दी। इसके बाद उन्होंने योजना के तहत 10 हजार रुपये का ऋण लिया और पूजा सामग्री की दुकान शुरू कर दी। छोटे से कारोबार से शुरू हुआ सफर धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया। कारोबार बढ़ाने के लिए उन्होंने 20 हजार और फिर 50 हजार रुपये का ऋण लिया। मेहनत रंग लाई और उनकी दुकान चल निकली।
बच्चों की पढ़ाई भी नहीं रुकने दी
बबीता के सामने सिर्फ घर चलाने की चुनौती नहीं थी, बल्कि बच्चों का भविष्य संवारने की जिम्मेदारी भी थी। उन्होंने बताया कि पति ने तीनों बेटों की पढ़ाई छुड़वा दी थी। उन्होंने अपने बड़े बेटों विनय और राहुल को स्नातक तक पढ़ाया। दोनों अब नौकरी कर रहे हैं। छोटा बेटा अभी 10वीं कक्षा में पढ़ रहा है।
खुद संभलीं तो दूसरों का हाथ थामा
बबीता ने खुद मुश्किलों से निकलकर दूसरे जरूरतमंद लोगों की मदद को भी जीवन का हिस्सा बना लिया। उनका दावा है कि अब तक वह करीब 100 लोगों को प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना का लाभ दिलवा चुकी हैं। बबीता कहती हैं कि जिस योजना ने उन्हें मुश्किल दौर से निकलकर अपने पैरों पर खड़े होने में मदद की, उसकी जानकारी दूसरे जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाना भी उनकी जिम्मेदारी है।
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