गाजियाबाद। सरकार की सख्ती और जन जागरूकता के बाद भी बाल श्रम पर पूरी तरह से प्रतिबंध नहीं लग पा रहा है। जिन हाथों में कलम और कॉपी होनी चाहिए, उन हाथों में जूठे बर्तन और रिंच थमाई जा रही हैं। इस साल श्रम विभाग ने हर महीने बाल श्रम को रोकने के लिए अभियान चलाया। इस दौरान 67 बच्चों को न केवल बाल श्रम से मुक्ति दिलाई, बल्कि उनको समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का काम भी किया। वहीं, बाल श्रम और किशोरों से श्रम कराने वाले 232 लोगों के खिलाफ न्यायालय में वाद भी दर्ज कराया।
उप श्रमायुक्त अनुराग मिश्र ने बताया कि पिछले साल तक हर तीसरे महीने बाल श्रम के खिलाफ अभियान चलाया जाता था। अब इसे हर महीने चलाया जा रहा है। जहां 2023 -24 में 126 निरीक्षण कर 14 साल से कम के 22 और 128 किशोरों को मुक्त कराया गया था, वहीं, 2024-25 में 285 निरीक्षण टीम द्वारा किए गए। जिसके बाद 14 वर्ष तक के 37 और 14 से 18 वर्ष के बीच के 30 बाल श्रमिकों को मुक्त कराया गया। पिछले साल 89 और इस साल 232 केस बाल श्रम के खिलाफ दर्ज कराए गए हैं।
उप श्रमायुक्त ने बताया कि गैर खतरनाक व्यवसायों में काम करने वाले 256 किशोरों को मुक्त कराकर उन्हें शिक्षा और रोजगार के लिए प्रेरित किया गया। इस सप्ताह के जनजागरूकता दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। एक हफ्ते तक प्रचार वाहन से जिले में जनजागरूकता की जाएगी। इसके साथ ही उद्यमियों और समाज सेवियों के साथ मिलकर गोष्ठी का आयोजन किया जाएगा।
-बाल श्रम कराने पर जेल और जुर्माने का प्रावधान
उप श्रमायुक्त ने बताया कि बाल श्रम निषेध अधिनियम के तहत बाल श्रम कराने पर कम से कम 1000 रुपये जुर्माने और कम से कम एक महीने की सजा का प्रावधान है। वहीं, यदि खतरनाक श्रेणी में आने वाले कारखानों और निर्माण साइट पर बच्चे या किशोर काम करते हुए पाए जाते हैं तो नियोजक पर कम से कम 20 हजार रुपये का जुर्माना लगाने का प्रावधान है। इसके साथ ही छह महीने तक सजा का भी प्रावधान है। बताया कि बाल श्रम उन्मूलन के लिए हर तरह से प्रयास किए जा रहे हैं। शैक्षिक, आर्थिक पुनर्वासन के लिए काम किए जा रहे हैं। पिछले दो सालों में 16 बच्चों को बाल श्रम से मुक्त कराकर स्कूल में दाखिला दिलाया गया। 18 के ई-श्रम कार्ड बनाए गए। 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुके 17 को निर्माण श्रमिक बनाया गया।
-आर्थिक कमजोरी का उठा रहे नाजायज फायदा-
श्रमायुक्त ने बताया कि जब बाल श्रमिकों को मुक्त कराया जाता है तो उन्हें चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के सामने पेश किया जाता है। ज्यादातर मामलों में सामने आया कि परिवार की आर्थिक दशा कमजोर होने का नाजायज फायदा नियोजक उठाते हैं। बाल मजदूरों के साथ परिवार के लोगों को भी विभाग की ओर से शिक्षित और जागरूक किया जाता है। निरीक्षण के दौरान जो बाल श्रमिक मिलते हैं, उनमें ज्यादातर मध्य प्रदेश, बिहार से होते हैं। इन बच्चों के माता-पिता दिल्ली-एनसीआर में मजदूरी करने आते हैं और झांसे में आकर अपने बच्चों को मजदूरी के लिए भेज देते हैं।