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Ghaziabad News: शासन से अटका 48 करोड़, लटकी नगरीय स्वास्थ्य व्यवस्था

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आशुतोष यादव
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गाजियाबाद। जिले में स्वास्थ्य व्यवस्था इन दिनों वेंटीलेटर पर पहुंच चुकी है। शासन से 48 करोड़ रुपये का बजट अटका पड़ा है। उसका सीधा असर मरीजों के इलाज से लेकर संविदा कर्मचारियों की रोजी-रोटी पर पड़ रहा है। 53 नगरीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का छह महीने से किराया नहीं दिया गया है। कई भवन मालिकों ने क्लीनिक खाली कराने का नोटिस थमा दिया है। संविदा पर काम करने वाले सैकड़ों कर्मचारियों को न वेतन मिल रहा है, न भविष्य की कोई गारंटी। टीबी के 12 हजार मरीज पोषण राशि के लिए तरस रहे हैं, जननी सुरक्षा योजना (जेएसवाई) के तहत प्रसूता महिलाओं को उनके हक की रकम नहीं मिल रही। बिजली, इंटरनेट और अन्य सेवाओं के भुगतान बंद होने से कई जगह बुनियादी सुविधाएं ठप हो गई हैं।

मरीजों के सामने अपमानित हो रहे डॉक्टर और स्टाफ
नोडल अधिकारी डॉ. आरके गुप्ता ने बताया कि कई नगरीय स्वास्थ्य केंद्रों के प्रभारी लगातार सीएमओ कार्यालय में शिकायत दे रहे हैं कि किराया न मिलने की वजह से भवन मालिक कर्मचारियों और डॉक्टरों के साथ बदसलूकी कर रहे हैं। कई जगह डॉक्टरों को मरीजों के सामने अपमानित किया जा रहा है। ऐसी घटनाएं स्टाफ का मनोबल तोड़ रही हैं। भवन मालिकों ने कई केंद्रों को खाली कराने के लिए नोटिस भेजने की धमकी दे रहे हैं। एक महिला चिकित्सक ने नोडल अधिकारी को वीडियो उपलब्ध कराया है। इसमें स्वास्थ्य केंद्र में मरीज बैठे हैं, उनके सामने ही भवन मालकिन अपशब्दों का प्रयोग करते हुए चिकित्सक को धमकाते हुए कह रही है कि कब तक मुफ्त में बैठोगे मकान खाली करो। वह सीएमओ और नोडल को भी अपशब्द कह रही है।
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संविदा कर्मचारियों की जिंदगी अधर में
सबसे ज्यादा परेशानी संविदा कर्मचारियों को हो रही है। करीब 700 संविदा कर्मचारी ऐसे हैं, जिनकी ईएसआई की किश्तें जमा नहीं हो रहीं। कई को पिछले महीनों से वेतन नहीं मिला है। एक नर्सिंग मिडवाइफ (एनएम) का कहना है कि सुबह 8 बजे से शाम तक ड्यूटी करते हैं, रात को डिलीवरी में रुकते हैं लेकिन दो महीने से तनख्वाह नहीं मिली। बच्चों की स्कूल फीस भरनी है, घर का किराया है पर समझ नहीं आता कहां जाएं।

एक लैब टेक्नीशियन का कहना है कि टीबी मरीज की जांच करते हैं, खून के नमूने लेते हैं लेकिन जब परिवार में कोई बीमार हाेता है तो इलाज के पैसे भी नहीं होते। अब तो स्टाफ यही सोच रहा है कि नौकरी छोड़ दें या फिर किसी प्राइवेट लैब में कम पैसा लेकर काम कर लें, कम से कम समय पर मिल तो जाएगा।


टीबी मरीज और प्रसूताएं परेशान
जिले में करीब 12 हजार टीबी मरीज पोषण राशि के लिए इंतजार कर रहे हैं। शासन से बजट न मिलने के कारण पिछले छह महीने से उन्हें कोई भुगतान नहीं हुआ है। जननी सुरक्षा योजना भी इस वित्तीय जाम में फंसी हुई है। कई महिलाओं को प्रसव के एक महीने बाद भी योजना के तहत निर्धारित राशि नहीं मिल पाई है। नर्सिंग स्टाफ के मुताबिक प्रसूता जब पूछती है कि पैसा कब मिलेगा, तो हमें जवाब देते नहीं बनता। वो समझती है हम झूठ बोल रहे हैं, लेकिन हमारे पास देने के लिए कुछ है ही नहीं।


ठप हो रही तकनीकी और बुनियादी सेवाएं
बिजली बिल और इंटरनेट कनेक्शन का भुगतान भी महीनों से लंबित है। कई जगह बिजली निगम ने बिल जमा नहीं होने पर कनेक्शन काटने की चेतावनी दी है। इंटरनेट का भुगतान बंद होने से सरकारी पोर्टल्स पर मरीजों का डेटा अपलोड होना भी बंद होने का अंदेशा बढ़ गया है। जांच रिपोर्ट में देरी हो रही है। वेंडरों को भुगतान नहीं होने के कारण वाहन मालिकों ने वाहन उपलब्ध कराने से मना कर दिया है। एक फार्मासिस्ट ने बताया बच्चों की बजट के अभाव में कई दवाइयों की आपूर्ति शासन स्तर से नहीं हो पा रहा है।
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सीएमओ ने कहा पोर्टल अपडेट होते ही जारी होगा बजट
सीएमओ डॉ. अखिलेश मोहन का कहना है कि शासन स्तर से नया एचएमएस पोर्टल स्पर्श तैयार किया जा रहा है। इसी वजह से भुगतान प्रक्रिया अटकी है। जैसे ही पोर्टल पूरी तरह चालू हो जाएगा, सभी लंबित भुगतान ऑनलाइन जारी कर दिए जाएंगे।
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