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डिप्थीरिया ने छीन ली एक और घर की ‘खुशी’, मिला होता सीरम तो बच सकती थी जान

Fri, 26 Oct 2018 09:35 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला, गाजियाबाद
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डिप्थीरिया से जनपद में एक और मौत हो गई। लोहियानगर की रहने वाली साढ़े चार साल की खुशी की बुधवार सुबह महर्षि वाल्मीकि अस्पताल में मौत हो गई। जनपद में डिप्थीरिया से यह तीसरी मौत है।

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बच्ची के पिता अशोक मंडल ने बताया कि खुशी को एक हफ्ते से बुखार था। स्थानीय डाक्टर को दिखाकर उसे बुखार की दवा दी जा रही थी। हालत में सुधार न होने पर मंगलवार को उसे संयुक्त जिला अस्पताल ले गए थे। वहां के डाक्टर ने डिप्थीरिया बताकर दिल्ली के महर्षि अस्पताल रेफर कर दिया था।

बच्ची की आवाज निकलनी बिल्कुल बंद हो गई थी। उसके गले की नली का छोटा सा ऑपरेशन किया गया। बुधवार को नर्स ने नली डालकर गले की सफाई की। उसके कुछ देर बाद ही खुशी की मौत हो गई। अशोक मंडल ने बताया कि उनके दो बेटे भी हैं, दोनों को ही बुखार और सर्दी-खांसी की समस्या है।
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पुष्टि नहीं कर रहा स्वास्थ्य विभाग
वहीं जिला प्रतिरक्षण अधिकारी विश्राम सिंह का कहना है कि जब तक रिपोर्ट नहीं मिल जाती, तब तक बच्ची की डिप्थीरिया से मौत की पुष्टि नहीं करेंगे। उधर, स्वास्थ्य विभाग ने बुधवार को आनन-फानन में लोहियानगर में सभी बच्चों को एंटी डिप्थीरिया के डोज दिए हैं। 

अभियान की हवा निकली

प्रदेश में चल रहे बच्चों के टीकाकरण अभियान की हवा डिप्थीरिया (गलघोंटू बीमारी) ने निकाल दी है। वर्षों से चले आ रहे इस अभियान में करोड़ों-अरबों रुपये खर्च हो गए हैं। फिर भी प्रदेश में इस बीमारी से बच्चों की मौत हो रही है। इससे पहले मसूरी थाना क्षेत्र के कल्लूगढ़ी निवासी बच्ची की मौत हुई थी।

इसके अलावा एक और बच्चे की जान चली गई थी। तब स्वास्थ्य विभाग ने 10 हजार बच्चों का सर्वे किया था। दावा किया था कि इनमें से 9700 बच्चों का टीकाकरण किया गया। बूस्ट डोज दिया गया। टीकाकरण से 300 बच्चे छूट गए थे।

इसके अलावा सरकार द्वारा इंद्रधनुष और सघन इंद्रधनुष अभियान भी चलाया गया, जिसमें नवजात शिशु से लेकर पांच साल तक के बच्चों को सरकारी स्तर पर नियमित टीकाकरण अभियान के माध्यम से टीके लगाए गए। इसमें भी करोड़ों रुपये का बजट खर्च हुआ। इसके बावजूद डिप्थीरिया के केस मिल रहे हैं।
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क्या है डिप्थीरिया

डिप्थीरिया एक संक्रामक बीमारी है, जो कारीनेबैक्टीरियम डिप्थीरिया वायरस के कारण होती है। सांस लेने में दिक्कत, गर्दन में सूजन, बुखार, खांसी इसके लक्षण हैं। यह बीमारी जानलेवा भी हो सकती है। संपर्क  में आने वाला व्यक्ति भी संक्रमित हो सकता है। 

इससे बचाव के लिए पांच साल तक टीके लगाए जाते हैं। नियमित टीकाकरण में डीपीटी (डिप्थीरिया, परटूसस (काली खांसी) और टिटनेस) का टीका लगाया जाता है। एक साल तक तीन टीके, डेढ़ साल पर चौथा टीका और चार साल पर बूस्टर डोज और पांच साल पर अंतिम टीका लगता है।

नहीं था जिला अस्पताल में सीरम
इमरजेंसी केस से निपटने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने एंटी डिप्थीरिया सीरम के 100 इंजेक्शन कसौली की एक कंपनी से मांगे थे। सीरम को सभी जिला अस्पतालों में भी उपलब्ध कराना था। लेकिन अभी तक टीके नहीं मिले हैं। जिला प्रतिरक्षण अधिकारी डॉ. विश्राम सिंह ने बताया कि रिमाडंर भी भेजा जा चुका है, लेकिन अभी तक सीरम उपलब्ध नहीं हो पाए हैं।
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