हरियाणा सीमा पर दिल्ली के इस आखिरी गांव टीकरी कलां का क्रांतिकारी इतिहास रहा है। यह गांव 1208 में बसा था। चौधरी लज्जेराम, चौधरी तुलसी राम, छोटू राम जैसे स्वतंत्रता सेनानी इस गांव से निकले थे। इन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू, मोरारजी देसाई के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया। बड़े-बुजुर्गों का कहना है कि गांव में सुभाष चंद्र बोस ने यहां अपना अंतिम भाषण दिया था और अंडरग्राउंड हो गए थे। आज भी हर साल उनके जन्मदिन के मौके पर टीकरी गांव में रागिनी कार्यक्रम का आयोजन होता है। उनकी स्मृति में यहां पर आजाद हिंद ग्राम बना है।
टीकरी गांव के महत्वपूर्ण बिंदु...
- जाट बहुल गांव की 80 फीसदी आबादी खेती पर निर्भर है।
- गांव की आबादी 20-25 हजार के बीच है।
- 90 फीसदी से ज्यादा यहां ग्रामीण निवासी हैं।
- 800 साल पुराना गांव है।
- गेहूं, सरसों, गाजर, गोभी और टमाटर मुख्य फसल है।
- पशुओं के लिए ज्वार, बाजार और मक्का उपजाते हैं।
- गांव के किसानों के पास 12000 बीघा जमीन है। इसके 50 फीसदी हिस्से खेती हो रही है।
स्थानीय निवासियों की राय:
सरकार पहले तो पराली एक्ट वापस लें। दिल्ली में पराली के कारण न के बराबर प्रदूषण होता है। इससे किसानों पर बेवजह केस दर्ज होंगे, पुलिस किसानों से वसूली करेगी। प्रदूषण के असल कारण के खिलाफ सरकार कदम उठाए तो शायद लोगों को राहत मिले।
-उमेद सिंह, स्थानीय निवासी ( उम्र- 78 साल)
खेती के लिए लगाई गई मशीनों पर से सरकार कामर्शियल बिजली का बिल वसूली बंद करे। दिल्ली सरकार भी यह जान ले कि वह किसानों के हक में कुछ नहीं कर रही है। दिल्ली के किसानों को आज तक एमएसपी नहीं मिला। दिल्ली के किसान इस आंदोलन के साथ हैं।
- मास्टर जयदेव सिंह (उम्र- 75 वर्ष)
दिल्ली-गाजियाबाद बॉर्डर पर स्थित इस गांव का अतीत पृथ्वीराज चौहान के जमाने से जुड़ता है। पहले यहां खेती-किसानी होती थी। ग्रामीणों का कहना है कि 1978 में इस इलाके से खेतीबाड़ी पूरी तरह खत्म हो गई थी। उस दौरान दिल्ली सरकार ने यहां किसानों से उनकी जमीनों का अधिग्रहण कर लिया था। आज की गाजीपुर सब्जी मंडी समेत मंडियों का पूरा इलाका, गाजीपुर लैंडफिल आदि को गांव की जमीन पर पर ही बसाया गया है। इस गांव की जमीन का विस्तार आनंद विहार बस अड्डे तक था।
गाजीपुर गांव के महत्वपूर्ण बिंदु:
- गांव सिमट कर दो से 3 किलोमीटर के दायरे में ही रह गया है।
- आबादी 90 फीसदी गुर्जर।
- खेती किसानी खत्म होने से किराएदारी हो गया स्थानीय निवासियों का मुख्य पेशा।
- पटपड़गंज औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वाले पूर्वी यूपी और बिहार के लोगों ने किराए पर ले रखा है मकान।
- कांग्रेस के पूर्व विधायक नसीब सिंह इसी गांव के निवासी हैं।
स्थानीय निवासियों की राय:
किसान आंदोलन का गांव पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है। हालांकि, गांव के लोग किसानों का पूरी तरह समर्थन करते हैं। किसानों की जायज मांगें सरकार को मांग लेनी चाहिए। ऐसा न होने पर देशवासियों के पास खाने को नहीं होगा।
-भीम सिंह, स्थानीय निवासी
हमारे गांव की खेती तो पहले ही खत्म हो गई है, इससे सब अपना-अपना व्यवसाय कर रहे हैं। ज्यादातर लोगों ने अपने मकान किराए पर दे रखे हैं और यही आय का मुख्य जरिया बना हुआ है। जहां तक किसान आंदोलन की बात है, गांव के लोग किसानों के साथ हैं। हमको आंदोलन से कोई समस्या नहीं है। सरकार को किसानों की बातों को सुनना चाहिए और उनकी वाजिब मांगें पूरी भी करनी चाहिए।
-प्रवीण कुमार, स्थानीय निवासी
जीटी करनाल रोड पर दिल्ली का आखिरी गांव सिंघु किसान आंदोलन के कारण सुर्खियों में है। करीब 150 पहले बवाना से खेती के लिए आए सिंह राम को नहीं मालूम था कि समय के साथ उनके नाम में परिवर्तन के बाद गांव का नाम बदलकर सिंघु हो जाएगा। सिंघु बॉर्डर पर किसानों का आंदोलन खेती कानूनों पर किसानों के आक्रोश का केंद्र बन चुका है। दिल्ली के दायरे को पार करते हुए पंजाब-हरियाणा की संस्कृति और विरोध के रोजाना नए रंग भी दिख रहे हैं। इस गांव से यमुना तट पर पल्ला गांव करीब छह किलोमीटर की दूरी पर है। इसे पार करते ही उत्तर प्रदेश की सीमा में दाखिल हो जाते हैं। खेती के लिहाज से इस गांव का पानी थोड़ा खारा है, लेकिन फसल अच्छी होती है। गांव का नाम पूरी दुनिया में प्रसारित हो चुका है।
सिंघु गांव के आंकड़े...
- 150 साल पहले बवाना के एक किसान ने बसाया था गांव
- गांव की करीब पांच हजार की है आबादी
- 35 एकड़ की जमीन पर होती खेती
- जाट बहुल है गांव
- गेहूं, धान के अलावा गोभी
गांव में सभी सुविधाएं हैं। पिछले वर्षों के दौरान स्थानीय लोगों के साथ साथ दूसरे प्रदेशों के लोग भी यहां काफी संख्या में रह रहे हैं। यहां धान, गेहूं के अलावा सब्जियों की खेती होती है। किसानों को एमएसपी नहीं मिलने का दर्द है।
-राजेंद्र सिंह, स्थानीय निवासी
खेती के लिए यहां की जमीन काफी उपयोगी है। मगर, किसानों को किसी भी फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य अब तक नहीं मिला है। मंडी में बेचने पर प्रति क्विंटल कम से कम 400 रुपये का नुकसान होता है। किसानों की इस मांग पर सरकार को गौर करना चाहिए।
-रण सिंह, स्थानीय निवासी
किसानों के आंदोलन के कारण गांव में इतनी भीड़ होने लगी है कि दिल्ली से सोनीपत जाने के लिए इसी गांव के मार्ग का रोजाना इस्तेमाल हो रहा है। कुंडली के लिए यहां से जाने वाली सड़क होने की वजह से रात तक जाम की स्थिति बनी रहती है। वैकल्पिक रास्ता न होने और आखिरी गांव होने की वजह से स्थानीय लोगों को जाम से जूझना पड़ रहा है।
-सुरेंद्र सिंह, स्थानीय निवासी