शिरोमणि अकाली दल बादल के प्रधान सुखवीर सिंह बादल के खिलाफ मोर्चा खोलना पूर्व प्रदेशाध्यक्ष और डीएसजीपीसी के पूर्व अध्यक्ष मनजीत सिंह जीके को भारी पड़ता नजर आ रहा है। पहले विपक्ष के भ्रष्टाचार के आरोपों पर कमेटी उनके बचाव में दिखती थी, लेकिन अब पूरी कमेटी ही उनके खिलाफ खुलकर आ गई है।
इससे जीके के राजनीतिक भविष्य पर भी सवाल उठने लगे हैं। जीके लगातार छह वर्ष डीएसजीपीसी अध्यक्ष रहे। पहली बार में वे चार वर्ष अध्यक्ष रहे। दूसरी बार भी उनके नेतृत्व में कमेटी में बादल गुट ने जबरदस्त जीत हासिल की। इसका श्रेय उनकी ईमानदार छवि को दिया गया था।
इसी कारण हाईकमान भी उनकी शर्तो के आगे झुका और इच्छानुसार कार्यकारिणी बनाने की इजाजत दी। जीके की मात्र महासचिव पद पर नहीं चली। इस पद पर मनजिद्र सिंह सिरसा आ गए और दोनों के मनमुटाव खुलकर सामने आए। सिरसा ने भ्रष्टाचार और महिला से छेड़छाड़ के मामले में कमेटी के प्रबंधक को हटाया तो जीके ने उनके फैसले को बदल दिया।
सिरसा बादल के खासमखास माने जाते हैं। यही कारण है कि जीके के पार्टी हाईकमान से संबंध खराब होते गए और ईमानदार छवि के बावजूद उन्हें भ्रष्टाचार के आरोपों में पद छोड़ना पड़ा। इसके बावजूद कमेटी सदस्य कहीं-न-कहीं उन्हें बचाने में ही लगे रहे।