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Delhi NCR News: भारतीयों में हार्ट अटैक का खतरा, विदेशी मॉडल सही अनुमान लगाने में नाकाम

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- कई बड़े मेडिकल संस्थानों जैसे गोविंद बल्लभ पंत इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्टग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, एम्स की दिल्ली कैंसर रजिस्ट्री और ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज के वैज्ञानिकों ने मिलकर किया शोध
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- शोध में लगभग 5,000 ऐसे मरीजों का डाटा शामिल किया गया, जिन्हें पहली बार हार्ट अटैक आया था

अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। दिल की बीमारी को लेकर गंभीर चिंता सामने आई है। दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले हार्ट डिजीज रिस्क कैलकुलेटर भारतीय मरीजों के लिए उतने भरोसेमंद नहीं हैं, जितना अब तक माना जाता रहा है। यह मॉडल अक्सर उन लोगों को कम या मध्यम जोखिम में रख देते हैं, जिन्हें असल में अधिक खतरा होता है। यह खुलासा हालिया एक अध्ययन में हुआ। इसमें देश के कई बड़े मेडिकल संस्थानों जैसे गोविंद बल्लभ पंत इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्टग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, एम्स की दिल्ली कैंसर रजिस्ट्री और ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज के वैज्ञानिकों ने मिलकर की है। शोध में लगभग 5,000 ऐसे मरीजों का डाटा शामिल किया गया, जिन्हें पहली बार हार्ट अटैक आया था।


अध्ययन में चौंकाने वाली बात सामने आई। इसमें करीब 80 प्रतिशत मरीजों को हार्ट अटैक आने से पहले हाई रिस्क कैटेगरी में रखा ही नहीं गया था। यानी जिन लोगों को सबसे ज्यादा सावधानी और इलाज की जरूरत थी, वे सिस्टम की नजर में खतरे से बाहर थे। इस स्टडी में पांच बड़े इंटरनेशनल मॉडल की तुलना की गई, जिनमें फ्रेमिंगहम रिस्क स्कोर, एएससीवीडी जोखिम कैलकुलेटर, डब्ल्यूएचओ का रिस्क चार्ट, जेबीएस-3 जोखिम कैलकुलेटर और प्रीवेंट जोखिम स्कोर शामिल हैं। उदाहरण के तौर पर एएससीवीडी 2013 मॉडल ने केवल 12.3 प्रतिशत मरीजों को ही हाई रिस्क में रखा। बाकी ज्यादातर मरीज लो या मीडियम रिस्क में चले गए। इससे डॉक्टरों के लिए सही समय पर सख्त इलाज शुरू करना मुश्किल हो जाता है।
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भारतीयों में दिल की बीमारी का पैटर्न पश्चिमी देशों से अलग

जीबी पंत अस्पताल में कार्डियोलॉजी के प्रोफेसर और इस शोध में शामिल शोधकर्ता डॉ. मोहित गुप्ता ने बताया कि भारतीय या दक्षिण एशियाई होना अपने आप में एक रिस्क फैक्टर है। यानी सिर्फ लाइफस्टाइल ही नहीं, बल्कि जेनेटिक्स भी इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं। उन्होंने बताया कि इसकी एक बड़ी वजह यह है कि भारतीयों में दिल की बीमारी का पैटर्न पश्चिमी देशों से अलग होता है। यहां लोगों को कम उम्र में ही हार्ट प्रॉब्लम होने लगती है। इसके पीछे डायबिटीज का ज्यादा होना, शरीर में चर्बी का अलग तरह से जमा होना, तनाव और प्रदूषण जैसे कारण हैं।
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