गत मार्च में निजामुद्दीन मरकज में शामिल होने वाले तब्लीगी जमात के करीब 3500 विदेशी सदस्यों की देश वापसी फ़िलहाल संभव नहीं है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कोरोना काल में नियम व आदेशों का उल्लंघन कर इन जमातियों ने कई अन्य लोगों की जान को खतरे में डाल दिया, लिहाजा उनके खिलाफ कार्रवाई जरूर होगी। इन सभी को विदेशी अधिनियम, राष्ट्रीय आपदा अधिनियम के उल्लंघन का मुकदमा झेलना पड़ेगा।
केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर कहा कि इन लोगों की स्वदेश वापसी तब तक नहीं होगी जबतक उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमे की सुनवाई भारत की अदालतों में पूरी नहीं हो जाती।
गृह मंत्रालय की ओर से दायर इस हलफनामे में कहा गया है कि विदेशी जमातियों ने वीजा की शर्तों का उल्लंघन किया। उनके खिलाफ कार्रवाई किसी भी तरह से संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 22 का उल्लंघन नहीं है।
हलफनामे में मंत्रालय ने कहा है कि निजामुद्दीन मरकज में शामिल होने वाले 35 देशों के 2679 जमातियों का वीजा रद्द किया गया है। वीजा रद्द करने का निर्णय केस दर केस लिया गया है जबकि 2765 जमातियों को ब्लैकलिस्ट किया है। इन जमातियों के खिलाफ 205 एफआईआर दर्ज की गई है। 1906 फरार जमातियों के खिलाफ लुक आउट नोटिस जारी किया गया है।
11 राज्यों में उनके खिलाफ विदेशी अधिनियम, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम, महामारी रोग अधिनियम और आईपीसी के तहत 205 एफआईआर दर्ज की गईं है। 227 विदेशियों ने लुक आउट सर्कुलर जारी करने और ब्लैकलिस्ट करने से पहले ही देश छोड़ दिया था। सरकार ने कहा है कि किसी भी विदेशी तब्लीगी जमात के सदस्य को अब तक डिपोर्ट नहीं किया गया है क्योंकि उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही चल रही है।
शीर्ष अदालत मौलाना अला हदरामी और एक गर्भवती महिला सहित अन्य विदेशी जमातियों द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। इन लोगों ने वीजा रद्द करने व ब्लैकलिस्ट किए जाने को चुनौती दी है। बृहस्पतिवार को जस्टिस ए एम खानविलकर, जस्टिस दिनेश महेश्वरी और जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ ने सरकार के इस जवाब पर याचिकर्ताओं को अपना पक्ष रखने के लिए कहा है।
पीठ ने सुनवाई को 10 जुलाई तक के लिए डालते हुए याचिकाकर्ताओं से कहा है कि वे डिपोर्टेशन को लेकर संबंधित अथॉरिटी के पास जा सकते हैं। केंद्र सरकार ने यह भी कहा है कि कोई भी अवैध अप्रवासी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की बात कर रिट जारी करने के लिए नहीं कह सकता। न्यायालय को इस तरह की याचिका पर विचार नहीं करना चाहिए।