प्रसव के दौरान नवजात की रीढ़ व गर्दन की हड्डी में लगी चोट की एम्स में सफल सर्जरी की गई है। इलाज के बाद बच्चा अब पूरी तरह स्वस्थ है। देश में यह अपनी तरह की पहली सर्जरी है। इसके लिए एम्स के चिकित्सकों ने दुनियाभर में मौजूद तकनीक का अध्ययन किया और अमेरिका की एक सर्जरी से मदद लेते हुए इलाज किया।
पैदा होने के 17 महीने बाद तक चिकित्सकों की निगरानी में रहे बच्चे को हाल ही में एम्स के ट्रामा सेंटर से छुट्टी दी गई है। दरअसल, सामान्य प्रसव के दौरान ओनू की रीढ़ व गर्दन की हड्डी में चोट लग गई थी। जन्म के समय उसका वजन 4.5 किलो था। चोट लगने से नवजात की स्थिति नाजुक हो गई थी। उसे ऑक्सीजन सपोर्ट पर रखा गया।
जांच के दौरान ही ओनू को निमोनिया भी हो गया। हालत गंभीर होती देख मई 2022 में 5 महीने के ओनू को एम्स के ट्रामा सेंटर में लाया गया। यहां आने पर फिर से जांच की गई। इसमें पता चला कि उसे सांस लेने में भी दिक्कत है। शरीर के बाएं भाग में ऊपर व नीचे और दाएं भाग में नीचे के हिस्से में कोई हरकत नहीं हो रही थी। दाएं भाग का ऊपर का हिस्सा भी स्वस्थ नहीं था। इससे पता चला कि बच्चे के रीढ़ व गर्दन की हड्डी में चोट लगी है। इसे सर्वाइकल स्पाइन डिस्लोकेशन (सरवाइकल स्पोंडिलोप्टोसिस) कहा जाता है।
एम्स के चिकित्सकों का कहना है कि देश में यह अपनी तरह का पहला मामला था, इसलिए दुनियाभर में मौजूद सर्जरी की तकनीक का अध्ययन किया है। अमेरिका में इस तरह की सर्जरी की मेडिकल हिस्ट्री मिली जिसके आधार पर बच्चे की सर्जरी की गई। अब बच्चा पूरी तरह तरह से स्वस्थ है। एम्स के ट्रॉमा सेंटर के वेंटिलेटर पर 330 दिन बिताने के बाद ओनू घर लौट गया है। सर्जरी के लिए एम्स ने बड़ी टीम का गठन किया। इसमें न्यूरोसर्जरी के प्रोफेसर डॉ. दीपक गुप्ता, न्यूरो एनेस्थीसिया के प्रोफेसर डॉ. जीपी सिंह, न्यूरोफिजियोलॉजी के प्रो. डॉ. अशोक जरयाल, डॉ. शेफाली गुलाटी, डॉ. राकेश लोढ़ा सहित अन्य वरिष्ठ डॉक्टरों ने सहयोग दिया।
15 घंटे चली सर्जरी
मां को सामान्य एनेस्थीसिया दिया गया। साथ ही, बच्चे की रीढ़ की हड्डी को ठीक करने के लिए समानांतर ऑपरेशन थियेटर में 15 घंटे की लंबी सर्जरी चली। इस सर्जरी के दौरान पता चला कि मां का ब्लड ग्रुप बी पॉजिटिव और बच्चे का ब्लड ग्रुप ए पॉजिटिव था। सर्जरी के बाद से डॉक्टरों लगातार बच्चे पर नजर बनाए रखी और एक साल के फॉलोअप के बाद बच्चे की रीढ़ की स्थिरता हासिल कर ली।