सीएम उमर अब्दुल्ला और एलजी मनोज सिन्हा
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जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा हासिल करने के लिए अभी लंबा इंतजार करना होगा। जब तक राज्य की उमर सरकार केंद्र का भरोसा नहीं जीतेगी, तब तक सूबे को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिलेगा। इससे पहले न तो उपराज्यपाल मनोज सिन्हा की शक्तियों और निर्णयों पर अंकुश लगेगा और न ही केंद्र की उमर सरकार पर विशेष कृपा बरसेगी। फिलहाल केंद्र की निगाहें उमर सरकार का अलगाववादियों और नई सरकार में हो रही नियुक्तियों पर है। सरकार इन दो मामलों में उमर सरकार को ठोक बजा कर देखने के बाद ही सूबे को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने पर विचार होगा।
सरकार के अतिविशिष्ट सूत्र ने कहा कि अनुच्छेद 370 के खात्मे के बाद केंद्र ने सूबे को अलगाववाद और आतंकवाद से मुक्त कराने के लिए जमीनी स्तर पर काम किया है। मुख्य समस्या राज्य की सरकारों को प्रत्यक्ष या परोक्ष अलगाववादियों को मिलने वाला संरक्षण है। इस क्रम में राज्य सरकारें अलगाववादियों से सहानुभूति रखने वालों को अहम पद दे कर उपकृत करती है।
जब सूबा उपराज्यपाल शासन के अधीन था तब बड़ी मशक्कत के बाद सरकार में शामिल ऐसे तत्वों की पहचान कर उन्हें सरकारी पदों से हटाया गया। इसके बेहद सकारात्मक परिणाम मिल रहे हैं। मोदी सरकार नहीं चाहती कि ऐसे तत्वों को नई सरकार में संरक्षण मिले, जिससे केंद्र सरकार का सूबे को आतंकवाद और अलगाववाद मुक्त कराने के लक्ष्य कमजोर हो जाए।
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हर मुलाकात में उमर को समझाया
सूत्र ने कहा कि सूबे में नई सरकार के गठन के बाद सीएम उमर अब्दुल्ला ने कई बार दिल्ली की यात्रा की। हमने उन्हें पूर्ण राज्य का दर्जा हासिल करने के लिए रखी गई शर्त से हर बार अवगत कराया। उक्त सूत्र ने कहा कि अनुच्छेद 370 के खात्मे के बाद हुए विकास कार्यों के कारण कश्मीर में जमीनी स्तर पर बेहतर बदलाव की शुरुआत हुई है। दशकों बाद सिनेमा घर खुल रहे हैं। कोचिंग सेंटरों की घाटी में भरमार है। अगर यहां केंद्र चूक गया तो स्थिति फिर वहीं पहुंच जाएगी, जैसी स्थिति 370 के खात्मे से पहले से थी।
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एलजी की भूमिका पर लगाम संभव ही नहीं
सूत्र ने यह भी कहा कि फिलहाल जैसा वातावरण है, उसमें एलजी के अधिकारों और निर्णयों को संशोधित या बाधित करने का कोई सवाल ही नहीं है। अनुच्छेद 370 के खात्मे के बाद एलजी ने हर क्षेत्र में बेहतरीन काम किया है। ऐसे में उनके अधिकारों में कटौती का कोई सवाल ही नहीं है। अधिकारों में कटौती तब होगी जब केंद्र को नई सरकार पर भरोसा होगा।
पीडीपी के साथ गठबंधन सरकार का अनुभव साझा करते हुए उक्त सूत्र ने कहा कि सत्ता में रहते इन दलों का रुख सकारात्मक रहता है। हालांकि सत्ता से विदाई के बाद ये हार्डकोर अलगाववाद के समर्थन में आ जाते हैं। व्यापक अनुभव के आधार पर यह तय हुआ है कि भविष्य में ऐसा नहीं चलेगा। केंद्र आतंकवाद और अलगाववाद खत्म करने के लिए जिस रास्ते पर आगे बढ़ा है, उस पर कोई समझौता नहीं करेगा।