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बड़े विवाद के बाद भी नहीं मिला महिलाओं को हक

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रोहतक में पिछले साल दिसंबर माह में हरियाणा रोडवेज की बसों में दो बहनों के साथ महिला सीट पर बैठने को लेकर विवाद सामने आने के बाद भी कोई सजगता नहीं आई है।
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उस दौरान प्रदेशभर में महिलाओं को सीट मुहैया करवाने पर जोर दिया गया था। लेकिन अब भी अक्सर महिला सीट पर पुरुष यात्रियों का कब्जा रहता है। महिलाएं खड़े होकर सफर को मजबूर हैं।

महिला यात्री पुरुषों के दबदबे और बस स्टाफ की निष्क्रियता से आरक्षित सीटों पर आसानी से नहीं बैठ पातीं। इसके लिए या तो उन्हें तू-तू-मैं-मैं करनी पड़ती है या फिर खड़े होकर सफर पूरा करना पड़ता है।
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कोई नहीं निभा रहा जिम्मेदारी

विडंबना यह है कि बस में तैनात रोडवेज स्टाफ भी ऐसे लोगों को कुछ नहीं कहता। जबकि, महिला सुरक्षा को लेकर रोडवेज ने एक नियम बनाया हुआ है।

इसके तहत बसों में बैठी महिला यात्रियों को सीट दिलवाने की जिम्मेदारी बस स्टाफ की है। आम तौर से सिटी बसों में छह सीटें आरक्षित हैं।

महिला यात्रियों को सीट दिलवाना बस स्टाफ की नैतिक और विभागीय जिम्मेदारी है। इस काम को सिर्फ ड्यूटी न समझें। दायित्व समझकर इसके लिए आम यात्रियों को समझाएं भी। -डिपो महाप्रबंधक त्रिलोक चंद
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क्‍या है लड़कियों की राय

लड़कियां अपनी आरक्षित सीट के पास जाकर खड़ी हो जाती हैं। फिर भी पुरुष यात्री सीट नहीं छोड़ते हैं। अगर कहो भी तो अनसुना कर देते हैं। -योगिता, कॉलेज छात्रा

महिलाओं को सीट न मिलने से छेड़छाड़ करने वाले असामाजिक तत्वों को मौका मिल जाता है। बसों में अधिक सीटें आरक्षित होनी चाहिए। -ऊषा चौहान, यात्री

सीट न मिलने पर अगर कंडेक्टर से कहा भी जाए तो भी सुनवाई नहीं होती। झगड़ा करके कई बार सीट मिल जाती है तो कई बार पूरे सफर में खड़े रहना पड़ता है। -मीता, महिला बस यात्री

शाम की कक्षाओं के बाद बसों में भीड़ रहती है। सीट नहीं मिलती, इसलिए अब वह ऑटो से जाना ज्यादा अच्छा समझती है।
-सरला, कॉलेज छात्रा
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