दिल्ली के आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 के अनुसार राजधानी के अस्पतालों में प्रसूति की स्थिति में लगातार सुधार देखने को मिल रहा है। वर्ष 2007 के दौरान अस्पतालों में 74.57 फीसदी प्रसूति होती थीं, जबकि अब 87 फीसदी से भी ज्यादा है। वहीं, योग्य स्वास्थ्य कर्मियों की देखभाल में प्रसूति 90 फीसदी से ज्यादा हो रही हैं। 2007 में ही ये स्थिति करीब 79 फीसदी थी। डॉक्टरों के अनुसार, अस्पतालों में प्रसूति होने से जच्चा-बच्चा दोनों के जीवन को संकट से बचाया जा सकता है।
शिशु मृत्युदर को लेकर जमीनी स्तर पर संतोषजनक परिणाम देखने को मिल रहे हैं। इस आंकड़े को शून्य तक ले जाने में अभी और भी ज्यादा मेहनत की जरूरत है। साथ ही अस्पतालों में आईसीयू और शिशु केयर पर ध्यान देना भी बेहद जरूरी है। - डॉ. केके अग्रवाल, पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष-आईएमए
जन भागीदारी से स्वास्थ्य को बेहतर मुकाम पर लाया जा सकता है। शिशु व मातृ मृत्युदर के अलावा कुपोषण इत्यादि को लेकर चल रहे जागरूकता कार्यक्रमों की वजह से सफलता अब दिखाई देनी लगी है। हालांकि, सरकारी अस्पतालों को मजबूती देने की जरूरत है। -डॉ. सुमेध, राष्ट्रीय अध्यक्ष-फेडरेशन ऑफ रेजीडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन
दिल्ली के ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं हमेशा से ही मुद्दा रही हैं, लेकिन कुछ वर्षों में काफी काम हुआ है। आशा वर्कर से लेकर अस्पतालों में बढ़ रहीं प्रसूतियां इसके पीछे वजह है। हालांकि, ग्रामीण दिल्ली के सरकारी अस्पतालों को और मजबूती देने की जरूरत है।- डॉ. अंकित ओम, चेयरमैन-यूआरडीए