कड़ाके की सर्दी से जिले में जनजीवन अस्त-व्यस्त है। इसके साइड इफेक्ट भी सामने आ रहे हैं। सबसे बड़ा खतरा स्वाइन फ्लू को लेकर है।
अब तक स्वाइन फ्लू टाइप थ्री का कोई मरीज सामने नहीं आया है, लेकिन टाइप वन और टू के संभावित मरीज रोज भारी संख्या में अस्पताल पहुंच रहे हैं।
जिला स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले साल जनवरी में स्वाइन फ्लू के 15 मरीज मिले थे। मौसम के शुरुआती मिजाज को देखते हुए उम्मीद थी कि इस बार स्वाइन फ्लू का प्रकोप नहीं होगा, लेकिन गत एक सप्ताह से बदले मौसम के चलते स्वाइन फ्लू की दस्तक सुनाई देने लगी है।
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विशेषज्ञों की मानें तो स्वाइन फ्लू का वायरस 10 से 30 डिग्री तापमान पर बेहद सक्रिय रहता है। इस समय दिन और रात में तापमान 30 डिग्री से नीचे चल रहा है। टाइप वन और टू के संभावित मरीज तो पहुंच रहे हैं, लेकिन यही स्थिति रही तो टाइप थ्री का वायरस भी कहर बरपा सकता है।
सिविल सर्जन डॉ. पुष्पा बिश्नोई का कहना है कि अब तक स्वाइन फ्लू की तीसरी कैटेगरी का कोई केस पॉजीटिव नहीं मिला है। स्वाइन फ्लू से बचाव संभव है। इसकी रोकथाम के लिए प्रयास शुरू कर दिए गए हैं।
आंखों का सूख रहा पानी
सर्दी में हीटर का अत्यधिक इस्तेमाल आंखों पर
भारी पड़ रहा है। सेंटर फॉर साइट गुड़गांव के निदेशक डॉ. महिपाल सचदेव का
कहना है कि ड्राई आई में आंखों की ग्रंथियां आंसू का निर्माण नहीं कर
पातीं। यह समस्या सर्दी के मौसम में अधिक होती है, क्योंकि लोग बेहद नजदीक
रहकर हीटर आदि का उपयोग करते हैं। हीट से आंखों की सतह को नुकसान पहुंचता
है, जो अंधेपन का भी कारण बन सकती है।
क्या है कैटेगरी?
-टाइप वन में बुखार, खांसी, सर्दी जुकाम, खराश, उल्टी व दस्त होता है। इसमें दवा देने की भी जरूरत नहीं होती। मरीज केवल आराम करने से ठीक हो जाता है।
-टाइप टू में खांसी, सर्दी-जुकाम के साथ तेज बुखार भी आता है। पांच साल से छोटे बच्चे या 65 साल से ऊपर के बुजुर्ग में यह लक्षण हैं तो टैमी फ्लू दवा दी जाती है।
-टाइप थ्री में सांस लेने में तकलीफ, सीने में दर्द, भूख न लगने, खांसी में खून आने, ब्लड प्रेशर कम होने के लक्षण आते हैं। इसमें मरीज को आइसोलेशन वार्ड में भर्ती करके अलग से उपचार दिया जाता है।