लीवर में था 8 सेंटीमीटर का ट्यूमर
श्रीनगर निवासी मरीज को शुरुआती स्टेज का लिवर कैंसर (हेपैटोसेलुलर कार्सिनोमा) था। उनके लीवर में करीब 8 सेंटीमीटर का ट्यूमर पाया गया था। साथ ही, लीवर सिरोसिस भी काफी बढ़ चुका था। डॉक्टरों के अनुसार, यह कैंसर लंबे समय से चली आ रही फैटी लिवर बीमारी के कारण हुआ।
इस वजह से हुआ कैंसर
हैरानी की बात यह है कि मरीज न तो शराब पीता था, न ही उसे वायरल हेपेटाइटिस था और न ही वह मोटापे का शिकार था। डॉक्टरों का कहना है कि अस्वस्थ खानपान, जंक फूड और तैलीय भोजन की आदतों के कारण धीरे-धीरे लिवर को नुकसान पहुंचा, जो आगे चलकर कैंसर में बदल गया।
दो साल से थी पेशाब की गंभीर समस्या
मरीज की हालत को देखते हुए डॉक्टरों ने ओपन सर्जरी के बजाय ट्रांसआर्टेरियल कीमोएम्बोलाइजेशन (टीएसीई) नामक नॉन-सर्जिकल प्रक्रिया अपनाई। इस तकनीक में खून की नसों के जरिए सीधे ट्यूमर तक दवा पहुंचाई जाती है और उसकी खून की सप्लाई बंद कर दी जाती है। जांच के दौरान यह भी पता चला कि मरीज पिछले दो वर्षों से बढ़े हुए प्रोस्टेट के कारण पेशाब की गंभीर समस्या से जूझ रहा था। चूंकि मरीज एक ही प्रक्रिया सहन कर सकता था, इसलिए डॉक्टरों ने टीएसीई के बाद प्रोस्टेटिक आर्टरी एम्बोलाइजेशन भी किया। यह भी एक नॉन-सर्जिकल प्रक्रिया है, जिससे बढ़े हुए प्रोस्टेट की खून की सप्लाई कम कर उसे सिकोड़ दिया जाता है। यह संयुक्त प्रक्रिया करीब तीन घंटे चली। मरीज को 23 दिसंबर 2025 को अस्पताल में भर्ती किया गया था और इलाज के तीन दिन बाद उन्हें स्वस्थ हालत में छुट्टी दे दी गई।
फैटी लीवर को न करें नजरअंदाज
रेडियोलॉजी विभाग के निदेशक डॉ. अभय कपूर ने बताया कि फैटी लिवर को अक्सर हल्के में लिया जाता है, लेकिन समय पर ध्यान न देने पर यह सिरोसिस और कैंसर में बदल सकता है। उन्होंने बताया कि आधुनिक, इमेज-गाइडेड और मिनिमली इनवेसिव तकनीकें ऐसे हाई-रिस्क मरीजों के लिए सुरक्षित विकल्प साबित हो रही हैं। वहीं, मरीज ने कहा कि उन्हें कभी अंदाजा नहीं था कि फैटी लिवर कैंसर में बदल सकता है। बिना सर्जरी के हुए इस इलाज से उन्हें नई जिंदगी मिली है। डॉक्टरों ने लोगों से अपील की है कि फैटी लिवर को नजरअंदाज न करें और समय-समय पर जांच कराते रहें।