वार्ता के लिए भेजे गए आमंत्रण के जवाब में किसानों ने केंद्र सरकार पर किसानों को गुमराह करने, लेटलतीफी और आंदोलन कमजोर करने के प्रयास बताते हुए कहा कि किसान बातचीत के लिए तैयार है। कृषि कानूनों में संशोधन के प्रस्ताव को बार बार भेजने की बजाय सरकार खुले मन से किसानों के सामने ऐसा ठोस प्रस्ताव रखे, जिसे एजेंडा बनाकर बातचीत का रास्ता अग्रसर हो सके। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी के साथ तीनों कृषि कानूनों को निरस्त करने के लिए सरकार खुले मन के साथ आगे आए ताकि बातचीत से किसानों के इस मसले का हल निकल सके।
संयुक्त किसान मोर्चा की ओर संवाददाताओं को संबोधित करते हुए योगेंद्र यादव ने कहा कि किसानों का यह आंदोलन किसी व्यक्ति विशेष का नहीं है। सभी संगठनों की राय के बाद ही कोई निर्णय लिए जाते हैं। इस पर सवाल उठाना सरकार का काम नहीं है। योगेन्द्र यादव ने आरोप लगाया कि यह पत्र भी किसान आंदोलन को बदनाम करने का प्रयास है। इसे अलगावादी और क्षेत्रीय रंग देने की कोशिश की जाती रही है। किसानों ने साफगोई से अपनी बात रखने की कोशिश की, लेकिन सरकार ने तिकड़म और चालाकी की कोशिश में है।
योगेंद्र यादव ने कहा कि आंदोलन को कमजोर करने की कोशिश से किसान अब अस्तित्व की रक्षा के लिए मजबूर हो गए हैं। यादव ने कहा कि सरकार तीन कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग पर है। सरकार ने चालाकी से इन बुनियादी आपत्तियों को महज कुछ संशोधनों के तौर पर पेश करने की कोशिश की है। लेकिन किसान संगठन, किसी तरह के संशोधन के लिए राजी नहीं हैं। नौ दिसंबर को जो प्रस्ताव भेजे थे, वह पांच दिसंबर के मौखिक प्रस्ताव थे।इसे खारिज कर दिया फिर संशोधन की बात की जा रही है।
योगेंद्र यादव ने कहा कि एमएसपी पर भी सरकार की ओर से कोई स्पष्ट बात नहीं की गई है। इसमें वर्तमान खरीद प्रणाली का जिक्र किया गया। किसानों की मांग स्वामिनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू कर एमएसपी की गारंटी है। अगर ऐसे कानून का प्रस्ताव भेजेंगे तो इस पर किसान विचार करेंगे। वायु गुणवत्ता अधिनियम पर प्रस्ताव खोखला है, जवाब देना हास्यास्पद है।
भारतीय किसान यूनियन, राष्ट्रीय महामंत्री युद्धवीर सिंह ने कहा कि सरकार ने जिस तरह की प्रक्रिया अपनाई है, इसे देखकर आसानी से समझा जा सकता है कि सरकार इसे लटकाना चाहती है। तीनों कृषि कानूनों को निरस्त करने के लिए, इसे बहुत हल्के में ले रही है। 60 प्रतिशत जनता का प्रतिनिधित्व करता है किसान। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि सरकार को किसानों की बात सुनकर ससम्मान इसका निराकरण करने की दिशा में पहल करनी चाहिए।
मध्य प्रदेश के किसान नेता शिवकुमार कक्काजी ने कहा कि पांचवी बार हुई वार्ता के बाद किसानों ने कानूनों को मौत का फरमान बताते हुए निरस्त करने की मांग की। बावजूद इसके संशोधन के प्रस्ताव का कोई मतलब नहीं। ऐसे ही कानून लागू कर अमेरिका में अब दो फीसदी खेती रह गई है। सरकार जिद छोड़े और एमएसपी बड़ा विषय है। सभी पहलुओं पर गंभीरता से विचार कर बड़े मन के साथ किसानों के साथ एमएसपी सहित तीनों काले कानूनों को वापस लेना चाहिए। सरकार को एक अच्छा माहौल होना चाहिए। अच्छे माहौल में ही वार्ता हो पाएगी। अन्य किसान नेताओं ने भी प्रेस को संबोधित किया। गुरनाम सिंह चढूनी ने भी एमएसपी के मुद्दे पर सरकार से विचार के बाद तीनों कानूनों को रद्द कर इस मसले का जल्द हल के लिए कदम बढ़ाने का आग्रह किया।
गुरनाम सिंह चढूनी ने सरकार पर गुमराह करने का आरोप लगाते हुए कहा कि किसान बातचीत के लिए हर बार गए हैं और आगे भी जाएंगे। लेकिन सरकार इसके लिए खुले मन से तैयार हो। तीनों को रद्द करने के साथ सरकार एमएसपी की गारंटी दे।
23 फसलों की 100 फीसदी खरीद पर मिले एमएसपी
17 लाख करोड़ की तो कुल फसल है, इसे बेचने पर 14-1500 करोड़ मिलेगा तो पूरे देश की अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए सरकार को इसपर विचार किया जाना चाहिए। अगर 20 हजार प्रति एकड़ का नुकसान हो रहा है जबकि सरकार की ओर से छह हजार रुपये मिलेंगे। अगर, आपके पास पर्याप्त इंतजाम नहीं है, अगर मक्के का भाव, 1800 है और बीच का अंतर अगर सरकार दे दे, इसे इंकार कर दिया गया। पिछले साल पांच लाख करोड़ रुपये, देश का एनपीए इतनी बड़ी रकम है, 15 लाख करोड़, किसानों पर नहीं खर्च कॉरपोरेट़्स पर खर्च कर रही है। केंद्र सरकार कर, गारंटी सरकार दे।