कृषि कानूनों को लेकर पिछले करीब एक माह से भी अधिक समय से धरने पर बैठे किसानों ने सोमवार को गाजीपुर बॉर्डर पर आह्वान किया कि वह नए साल का जश्न अपने-अपने परिवारों के साथ बॉर्डर पर ही मनाएंगे। किसान नेताओं ने दिल्ली वासियों से भी अपील की है कि वह भी इस साल नए साल का जश्न किसानों के साथ मिलकर मनाएं और उनको हौसले को बढ़ाएं। गाजीपुर में धरने का संचालन कर रही कमेटी ने ऐलान किया कि इसके लिए बकायदा तैयारी की जा रही है।
महिलाओं को यहां सुविधाएं देने और उनके रहने-सहने के इंतजाम के लिए एक अलग कमेटी भी गठन भी कर दिया गया है। बाकी जगहों की तरह गाजीपुर बॉर्डर पर भी पिछले कई दिनों से क्रमिक अनशन का सिलसिला जारी है। सोमवार को मंच पर 11 किसान अनशन पर बैठे थे। डॉक्टरों ने अनशन कर रहे किसानों का मेडिकल चेकअप कर उनकी रिपोर्ट प्रशासन को भेजी।
संयुक्त किसान मोर्चा और भारतीय किसान यूनियन (दोआब-पंजाब) के अध्यक्ष मंजीत सिंह राय ने सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि सरकार की नियत ठीक नहीं है। अब सरकार के इशारे पर किसानों के खिलाफ मुकदमें भी दर्ज होने लगे हैं। उत्तराखंड में दिल्ली की ओर कूच कर रहे 1500 से अधिक किसानों के खिलाफ मुकदमें दर्ज कर लिये गए। उन्होंने कहा कि कोई भी किसान इस तरह के मुकदमों से न डरे।
मंजीत संयुक्त किसान मोर्चा के कुलदीप सिंह बाजीतपुर और अमरजीत सिंह कालहा के साथ गाजीपुर बॉर्डर पर आगे की रणनीति बनाने पहुंचे थे। इन लोगों ने कहा कि जहां-जहां भी किसानों के खिलाफ मुकदमें दर्ज हो रहे हैं, किसान अब उन इलाकों का घेराव करेंगे। किसान नेताओं ने मंच से यह भी ऐलान कर दिया कि किसी भी एक्टिव नेता को मंच पर नहीं चढ़ने दिया जाएगा।व् यदि कोई नेता यहां आना चाहता है तो वह साधारण किसान का बेटा बनकर यहां आकर बैठे। उसे मंच से विचार रखने की इजाजत नहीं होगी। मंच का संचालन कर रही कमेटी की ओर से यह भी कहा गया कि सरकार जब तक एमएसपी पर कानून बनाने के अलावा तीनों कानूनों को रद्द नहीं करेगी तब तक उनका आंदोलन ऐसे ही जारी रहेगा।
कृषि कानूनों के विरोध में गाजीपुर बॉर्डर पर धरने की शुरूआत किसान नेता राकेश टिकैत के नेतृत्व में हुई थी। पहले इसे पश्चिम उत्तर-प्रदेश के मुट्ठी भर किसानों का धरना बताया गया, लेकिन देखते ही देखते बॉर्डर पर किसानों की भीड़ बढ़ती ही चली गई। अब यहां यूपी, हरियाणा, पंजाब, उत्तराखंड, महाराष्ट् के अलावा कुछ अन्य राज्यों के किसान भी पहुंच रहे हैं। शुरूआत में गाजीपुर पुल (एनएच-24) के नीचे ही किसान धरने पर बैठे थे, लेकिन धरे-धरे किसान पुल के ऊपर गाजियाबाद ही ओर बढ़ते चले जा रहे हैं। अब हालात यह है कि गाजीपुर धरना स्थल से करीब पौन किलोमीटर के एरिये में किसानों के ट्रैक्टर ही ट्रैक्टर ही दिखाई देते हैं।
दिन के समय में दिल्ली-एनसीआर के लोग बड़ी संख्या में यहां घूमने आ आते हैं। बॉर्डर पर किसानों की जरूरत के हर सामान को उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। खाने-पीने के अलावा गर्म पानी के देसी गीजर, कंबल, रजाई, सर्दी से बचने के हर तरह के कपड़े का इंतजाम यहां हो चुका है। सड़क पर दूर तक किसी कबीलों की तरह से दिखने वाले तंबू लगे हैं। यहां जगह-जगह हुक्के और चाय के साथ सरकार से लड़ने की रणनीति तैयार होती रहती है।
बकायदा किसान आंदोलन का संचालन कर रही कमेटी के वालंटियर ने पूरे आंदोलन को संभाला हुआ है। साफ-सफाई से लेकर हर चीज का यहां ख्याल रखा जा रहा है। नौजवानों के साथ बुजुर्ग किसान भी यहां आंदोलन कर सरकार से लोहा ले रहे हैं। लंगर के अलावा मेडिकल कैंप, एंबुलेंस यहां 24 घंटे तैनात रहती हैं।