सिर्फ पत्नी के कमाने से पति अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता
सचिन कुमार
फरीदाबाद। आमतौर पर कानूनी जागरूकता और नियमों की सही जानकारी न होने के कारण आम लोगों के बीच यह धारणा बनी रहती है कि यदि पत्नी पढ़ी-लिखी है या नौकरी कर कमा रही है, तो वह पति से गुजारा भत्ता (रखरखाव) पाने की हकदार नहीं है। हालांकि, फरीदाबाद की एक अदालत ने कानूनी स्थिति को साफ करते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
अदालत ने स्पष्ट किया है कि पत्नी का कामकाजी होना या कमाना, पति को उसकी कानूनी जिम्मेदारी और गुजारा भत्ता देने की देनदारी से पूरी तरह मुक्त नहीं करता। इसके साथ ही, घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत मिलने वाली राहत अन्य कानूनों से अलग और अतिरिक्त होती है। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश केपी सिंह की अदालत ने दिए फैसले में घरेलू हिंसा के मामले में पत्नी को दिए पांच हजार रुपये मासिक अंतरिम गुजारा भत्ते को बरकरार रखा। पति ने इस आदेश को चुनौती देते हुए तर्क दिया था कि पत्नी शिक्षित है और नौकरी कर रही है, इसलिए उसे गुजारा भत्ता नहीं दिया जाना चाहिए। अदालत ने पति की अपील खारिज कर दी।
यह था पूरा मामला
मामले के अनुसार, एनएच-5 एनआईटी निवासी रजनी सहगल का विवाह 20 अगस्त 2014 को सेक्टर-21डी निवासी अजय खुराना के साथ हुआ था। उनके दो बच्चे भी हैं। महिला का आरोप था कि दहेज की मांग को लेकर उनके साथ मारपीट की गई और 30 जून 2022 को उन्हें बच्चों समेत घर से निकाल दिया गया। जिसके बाद महिला ने अपने और बच्चों के लिए घरेलू हिंसा अधिनियम (डीवी एक्ट) के तहत कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। न्यायिक दंडाधिकारी (जेएमआईसी) निधि सिवाच की अदालत ने 22 अगस्त 2024 को अंतरिम आदेश जारी करते हुए पति को पत्नी के लिए पांच हजार प्रति माह और दोनों बच्चों के लिए 4,500-4,500 प्रति माह (कुल 14,000) अंतरिम भत्ता देने का आदेश दिया था।