करनाल से आए सपेरा समाज के लोग बीन पार्टी से खींच रहे ध्यान
नीरज धर पाण्डेय
फरीदाबाद। सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय हस्तशिल्प मेले में देश-विदेश की कला और संस्कृति के बीच करनाल से आए सपेरा समाज की बीन पार्टी के कलाकारों ने अपनी पारंपरिक संगीत व नृत्य प्रस्तुति से दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया। बीन, तुंबा और चिमटा की धुन पर कलाकारों ने लोक शैली में प्रदर्शन किया, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटे रहे।
कलाकारों ने बताया कि उनकी प्रस्तुति में मुख्य रूप से तीन वाद्य यंत्र बीन, तुंबा और चिमटे का उपयोग किया जाता है, जिनकी ताल पर पारंपरिक नृत्य और संगीत प्रस्तुत किया जाता है। उन्होंने कहा कि इस तरह के मंच उन्हें अपनी सांस्कृतिक पहचान प्रदर्शित करने का अवसर देते हैं।
कलाकारों ने बताया कि पहले शादियों और अन्य शुभ अवसरों पर उन्हें बुलाया जाता था, जिससे उनकी आजीविका चलती थी। लेकिन समय के साथ लोगों की सोच बदलने से पारंपरिक कला को हीन दृष्टि से देखा जाने लगा है, जिसके कारण उन्हें बहुत कम काम मिल पाता है। हालांकि कुछ लोग आज भी उन्हें शुभ अवसरों पर बुलाते हैं, जिससे थोड़ी-बहुत कमाई हो जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि लोकप्रियता में कमी के कारण उनके समाज के कई लोग यह कार्य छोड़ रहे हैं।
संगीत और नृत्य प्रदर्शन के दौरान कलाकारों ने सपेरा समाज की पारंपरिक कला के संरक्षण का मुद्दा भी उठाया। उनका कहना है कि सांप पालने पर लगे प्रतिबंध के बाद पीढ़ियों से चली आ रही उनकी आजीविका प्रभावित हुई है और सरकार की ओर से इस कला को बचाने के लिए प्रयास नाकाफी हैं। बीन वादक विनोद नाथ ने कहा कि राष्ट्रीय आयोजनों में उनकी कला को अधिक अवसर दिए जाने चाहिए ताकि नई पीढ़ी देश की पारंपरिक संस्कृति से परिचित हो सके और कलाकारों को पहचान मिल सके।
उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि जैसे सूरजकुंड मेले में विदेशी कलाकारों को मंच दिया जाता है, उसी प्रकार अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में भारतीय कलाकारों विशेषकर विलुप्तप्राय पारंपरिक कलाओं से जुड़े समुदायों को भेजकर प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि इससे न केवल उनकी संस्कृति को संरक्षण मिलेगा, बल्कि भारत की कला विरासत का वैश्विक स्तर पर प्रचार-प्रसार भी होगा।