रूस-यूक्रेन युद्ध का असर औद्योगिक नगरी में दिखने लगा है। उद्यमियों का कहना है कि उन्हें महंगे दर पर रबड़, कॉपर, पाम ऑयल आदि को भी ऊंचे दामों पर खरीदना पड़ रहा है। इससे सामानों के उत्पादन पर 15 से 20 फीसदी अतिरिक्त लागत बढ़ गई है।
लघु उद्योग भारती अध्यक्ष रवि भूषण खत्री ने बताया कि जिले में छह हजार के आसपास रबड़ उद्योग हैं। इनके द्वारा ऑटो मोबाइल्स से लेकर रबड़ संबंधित सभी प्रकार के सामान बनाए जा रहे हैं। इसके लिए इंडस्ट्रियल प्रोसेसिंग ऑयल की काफी जरूरत पड़ती है।
एक इकाई महीने में कम से कम 30 ड्रम तक ऑयल का खपत करती हैं। एक ड्रम में 200 लीटर ऑयल होता है। ऐसे में रूस-यूक्रेन युद्ध से पहले उन्हें 200 रुपये प्रति लीटर के हिसाब से ऑयल मिलते थे। चूंकि इस ऑयल का ज्यादातर आयात रूस से किया जाता है। लिहाजा युद्ध के चलते इसके रेट बढ़ गए हैं।
अब उद्यमियों को 300 रुपये प्रति लीटर खर्च करना पड़ रहा है। इसी तरह पाम ऑयल पहले मलेशिया से आयात होता था। लेकिन अब पोलैंड से मंगाया जा रहा हैं। ऐसे में इसके भी दर बढ़े हैं। उद्यमी राजकुमार व सुरेंद्र जांगड़ा ने बताया कि शहर के इकाईयों में कॉपर आदि का ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है। इसका भी ज्यादातर आयात रूस से ही होता है।
रूस-यूक्रेन युद्ध से पहले एक टन कॉपर पर लगभग 10 लाख रुपये खर्च करने पड़ते थे। लेकिन बीते एक सप्ताह में इसके दर में 10 से 15 फीसदी तक का इजाफा हुआ है। अब एक टन कॉपर को मंगाने में लगभग 12 लाख रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। यही अन्य सामानों का भी है। सामानों को बनाने में लागत ज्यादा आ रही है। बचत की उम्मीद कम हो गई है।
78 प्रकार का कच्चा माल हुआ मंहगा
दोनों देशों के बीच बढ़े तनाव से औद्योगिक नगरी में मंगाए जा रहे 78 प्रकार के कच्चे माल की कीमत बढ़ी है। इससे उद्यमियों की परेशानी बढ़ गई है। लघु उद्योग भारती के पदाधिकारियों की मानें तो दोनों देशों के बीच चल रहे युद्ध का सबसे ज्यादा असर लघु उद्योगों पर पड़ा है। उद्यमियों का कहना है कि उन्हें इस समय किसी सामान को तैयार करने में लागत काफी आ रही है क्योंकि ज्यादातर इकाईयों को एक महीने या उससे पहले ऑर्डर मिले हैं। ऐसे में उसके दर भी पुराने हैं।