बड़खल झील को दोबारा आबाद करने की महत्वाकांक्षी परियोजना अब पर्यावरणीय चिंता का विषय बनती जा रही
संवाद न्यूज एजेंसी
फरीदाबाद। बड़खल झील को दोबारा आबाद करने की महत्वाकांक्षी परियोजना अब पर्यावरणीय चिंता का विषय बनती जा रही है। झील में लगातार बढ़े जलस्तर का असर अब आसपास के क्षेत्रों पर दिखाई देने लगा है। झील से सटे परसोन मंदिर परिसर में लंबे समय से जलभराव की स्थिति बनी हुई है, जिसके कारण यहां विकसित किया गया हरा-भरा बाग लगभग खत्म हो गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि परिसर में लगे 600 से अधिक पेड़-पौधे सूख चुके हैं।
मंदिर परिसर इन दिनों पानी से घिरा हुआ है। जलभराव वाले हिस्सों में जलकुंभी तेजी से फैल रही है और पानी से उठ रही दुर्गंध श्रद्धालुओं के लिए परेशानी का कारण बन रही है। लगातार जड़ों में पानी भरे रहने से पेड़ों का जीवन चक्र प्रभावित हुआ है और धीरे-धीरे अधिकांश पौधे सूख गए हैं।
प्राकृतिक जलमार्ग बदला तो बदले हालात
जानकारों के अनुसार, पहले अरावली की पहाड़ियों से निकलने वाला बरसाती पानी प्राकृतिक ढलान के जरिए परसोन मंदिर क्षेत्र से होकर बड़खल झील तक पहुंचता था। वर्षों से यही जलप्रवाह व्यवस्था बनी हुई थी। लेकिन झील के पुनर्भरण के बाद हालात बदल गए हैं। अब झील के भर जाने के कारण पानी विपरीत दिशा में बहकर मंदिर परिसर तक पहुंच रहा है। इससे वहां स्थायी रूप से पानी जमा रहने लगा है।
दुर्लभ पौधों का भी नहीं बचा अस्तित्व
परसोन मंदिर परिसर का बाग स्थानीय लोगों और पर्यावरण प्रेमियों के प्रयासों से तैयार किया गया था। यहां देश के विभिन्न हिस्सों से पौधे लाकर लगाए गए थे। बेंगलुरु से लाए गए चंदन के पौधे अब विकसित होने लगे थे, जबकि शिमला से मंगाए गए सेब के पौधे भी अच्छी स्थिति में थे। इसके अलावा परिसर में जामुन, लीची, अमरूद, पपीता, केला, गुलर, पीपल, बरगद, इमली और खिरनी सहित अनेक प्रजातियों के वृक्ष मौजूद थे। ग्रामीणों का दावा है कि इनमें कुछ वृक्ष कई सौ वर्ष पुराने थे।
पानी की गुणवत्ता पर उठे सवाल
ग्रामीणों और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों ने झील में छोड़े जा रहे पानी की गुणवत्ता की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि मंदिर परिसर तक पहुंच रहा पानी काले रंग का है और उससे तेज दुर्गंध आती है। उनका मानना है कि जलभराव के साथ-साथ पानी की गुणवत्ता भी हरियाली के नुकसान की एक वजह हो सकती है।
बड़खल झील के पुनर्जीवन की परियोजना का उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण था, लेकिन यदि इसके कारण आसपास की हरियाली नष्ट हो रही है तो इसकी गंभीरता से जांच होनी चाहिए। प्रशासन को विशेषज्ञों की टीम से पूरे मामले का अध्ययन कराना चाहिए।-विजय भारद्वाज, सेव अरावली ट्रस्ट
झील में छोड़े जा रहे पानी की गुणवत्ता की नियमित निगरानी की जाती है। मंदिर परिसर में जलभराव और पानी की गुणवत्ता को लेकर जो शिकायतें सामने आई हैं, उनकी दोबारा जांच कराकर आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।-बीर सिंह, प्रबंधक, स्मार्ट सिटी परियोजना