बीके सिविल अस्पताल में मरीज को बेड न मिलने पर दूसरे अस्पताल ले जाते परिजन।
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फरीदाबाद। संक्रमण का प्रकोप हावी है। लोगों को सिफारिशी नंबर डायल करने के बाद भी अस्पतालों में बेड हासिल करना मुश्किल हो रहा है। आलम यह है कि जिले के सिविल अस्पताल, बड़े निजी अस्पतालों, ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज में दिन में करीब 200 से अधिक फोन बेड, दवा व ऑक्सीजन की मांग संबंधी आ रहे हैं। इसमें से 99 फीसदी लोगों को जवाब में न मिल रहा है। वहीं, इसी माह की शुरुआत में जब संक्रमण का प्रकोप केवल सांकेतिक समझा गया, तब लगभग 99 फीसदी लोगों की मांग के अनुरूप सुविधाएं मिल रही थीं, इसमें बेड, दवाएं भी शामिल हैं। महज 24 दिन में यह तस्वीर बदल गई है। अब लोग बेबस अस्पतालों के दरवाजे पर दम तोड़ रहे हैं लेकिन कोई रुतबा और सिफारिश काम नहीं आ रही।
दिन में चार गुना ज्यादा फोन आ रहे
टैमीफ्लू, ऑक्सीजन और रेमेडिसिवर के लिए भी लोगों को चक्कर काटने पड़ रहे हैं। हालात यह हैं कि निजी अस्पताल के प्रबंध सहायक ने नाम न बताने की एवज में बताया कि दिन में करीब चार गुना ज्यादा फोन उठाने पड़ रहे हैं। इसमें से 40 फीसदी लोगों को बेड चाहिए। करीब 40 फीसदी को ऑक्सीजन और रेमेडिसिवर चाहिए। करीब दस फीसदी को टैमीफ्लू दवा तक नहीं मिल रही तो वह सिफारिश लगा रहे हैं। कई बार यह दवा मुहैया हो रही है, कई बार नहीं। अब हालात ऐसे हो गए हैं कि महज अपने अस्पताल में ही नहीं दूसरी जगह भी मरीजों को भर्ती करने की कोशिश कराते हैं, दवाएं मुहैया कराने की कोशिश कराते हैं तो भी काम नहीं हो रहा।
क्षमता से ज्यादा वेंटिलेटर, फिर भी स्थिति नहीं संभल रही
संक्रमण की स्थिति है कि एक दिन में स्वास्थ्य विभाग आधिकारिक आंकड़ों में आठ लोगों की मौत की पुष्टि कर रहा है तो नगर निगम व श्मशान भूमि पर 30 से ज्यादा लोगों की अंतेष्टि कोविड नियमों के अनुरूप की जा रही है। ऐसे में दम तोड़ते लोगों को बचाने के लिए निजी अस्पतालों का दावा है कि क्षमता से अधिक वेंटिलेटर का प्रबंध किया है, फिर भी स्थिति संभाले नहीं संभल रही।
लोगों का आरोप, वीआईपी सिस्टम हावी
संक्रमण से दम तोड़ रहे लोगों के परिजनों का आरोप है कि उनके परिवार के सदस्यों की मौत हो रही है। हर दिन वह मर रहे हैं, कई मामले ऐसे भी हैं कि एक ही परिवार से एक से अधिक लोगों ने बिगड़ते संक्रमण और इलाज के अभाव में दम तोड़ दिया। ऐसे में परेशान परिजनों का आरोप है कि वीआईपी सिस्टम हावी है। सही आंकड़े छुपाए जा रहे हैं, आर्थिक रूप से संपन्न अस्पतालों में किसी तरह भर्ती हो रहे हैं, उधर गरीब दम तोड़ रहे हैं तो भी आंकड़ों में छिपाए जा रहे हैं।