शरारत समझकर नजरअंदाज न करें माता-पिता, 46 से 89 प्रतिशत बच्चों में पाई जा रही शिकायत
भारती दुबे
फरीदाबाद। पिका एक विकार है जिसमें बच्चे बार-बार ऐसी चीजें खाते हैं जो भोजन नहीं हैं, जैसे मिट्टी, चॉक, बाल या कागज। माता-पिता को इसे शरारत समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य की एक गंभीर समस्या है।
निजी अस्पताल के मनोचिकित्सा विभाग की सीनियर कंसल्टेंट डॉ. मीनाक्षी जैन ने बताया कि पिका का संबंध बच्चों की भावनाओं और मानसिक स्थिति से गहराई से जुड़ा होता है। कई बार बच्चे तनाव, चिंता या अवसाद से गुजरते हैं और ऐसे में अजीब चीजें खाने लगते हैं। ऑटिज्म से पीड़ित बच्चों में यह समस्या और भी आम है। शोध बताते हैं कि 46 से 89 प्रतिशत ऐसे बच्चों में पिका की आदत पाई जाती है।
1- 6 साल और 12 साल तक के बच्चे अधिक प्रभावित
अंतरराष्ट्रीय रिसर्च से पता चला है कि कार्ला डी. स्टीवंस और उनकी टीम ने पिका डिसऑर्डर पर किए गए अध्ययन में पाया कि यह समस्या विशेष रूप से 1- 6 साल और 12 साल तक के बच्चों, खासकर ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों में अधिक देखी जाती है। उनका अध्ययन बताता है कि पिका के मामलों में मानसिक तनाव, चिंता और पोषण की कमी मुख्य कारण है।
लगभग 15 से 20 प्रतिशत मामलों में सर्जरी की जरूरत
अंतरराष्ट्रीय जर्नल ऑफ कंटेम्परेरी पेडियाट्रिक्स 2018 में शोधकर्ता सुमीता वर्मा और टीम ने निष्कर्ष निकाला कि पिका बच्चों में कई बार गंभीर शारीरिक जटिलताओं का कारण बन सकता है। इसमें पेट में ब्लॉकेज, आंतों में इंफेक्शन और खून की कमी शामिल हैं। रिसर्च के अनुसार, पिका के लगभग 15 से 20 प्रतिशत मामलों में सर्जरी की आवश्यकता पड़ सकती है।
केवल आदत नहीं, बल्कि जानलेवा बीमारी
यह सिर्फ अजीब आदत नहीं है, बल्कि कई बार जानलेवा साबित हो सकती है। डॉ. मीनाक्षी ने बताया कि मिट्टी, बाल, धागा खाने से शरीर में कीड़े और बैक्टीरिया जा सकते हैं। चॉक या पेंट खाने से जहरीले तत्व जैसे सीसा (लीड) शरीर में पहुंच सकते हैं। लगातार ऐसा करने से पेट में गांठ, आंतों में रुकावट और खून की कमी जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं।
दवा नहीं, काउंसलिंग और थेरेपी है पिका का इलाज
डॉक्टर की मानें तो पिका का इलाज केवल दवाओं से नहीं होता। इसमें मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग, व्यावहारिक थेरेपी और परिवार का सहयोग जरूरी है। जब बच्चों को सही काउंसलिंग दी जाती है और माता-पिता घर पर सहयोग करते हैं, तो वे धीरे-धीरे इस आदत से बाहर आ जाते हैं। साथ ही अगर खून की कमी या पोषण की कमी है, तो उसका इलाज भी करना पड़ता है।
जागरूकता की जरूरत
आज बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य उतना ही जरूरी है जितना शारीरिक स्वास्थ्य जरूरी है। पिका जैसे मामलों को हल्के में नहीं लेना चाहिए। डॉ. मीनाक्षी ने चिंता जताते हुए कहा कि माता-पिता और शिक्षकों को हर छोटी आदत पर ध्यान देना चाहिए। अगर बच्चा गैर- खाद्य चीजें खा रहा है, तो तुरंत विशेषज्ञ की मदद लें। समय रहते इलाज से बच्चों को सुरक्षित और स्वस्थ बनाया जा सकता है।