विषम परिस्थितियों में रह कर भी एक लड़की फर्श से अर्श तक पहुंच सकती है, इसका एक जीवंत उदाहरण है अफगानिस्तान के काबुल शहर से आई शहला सादत।
एक राज मिस्त्री के साधारण से घर में जन्म लेने वाली शहला तालिबानी कुंठित मानसिकता वाले देश में अपनी खुद की ज्वैलरी और हैंडलूम कंपनी का न केवल सफलतापूर्वक संचालन कर रही है, बल्कि अपने देश की महिलाओं की मदद भी कर रही है।
शहला ने बताया कि वर्ष 2017 में काबुल की हयात यूनिवर्सिटी से जनसंचार एवं पत्रकारिता में स्नातक तक शिक्षा ग्रहण की। उसके बाद माता-पिता के प्रोत्साहन से वह चीन में चंचा शहर चली गई। वहां एक साल तक शहला ने जुमोलॉजी सीखी।
आभूषण और कीमती पत्थरों के काम को उसने तल्लीनता से सीखा और काबुल आकर इसी विधा में कारोबार शुरू कर दिया। सादत बानु जेम्स एंड ज्वेलरी और सादत बानु हैंडीक्राफ्ट्स की सीईओ शहला सादत के पास तीस महिला कारीगरों का स्टाफ काम कर रहा है और लगभग दो सौ से अधिक महिलाएं उसके साथ हैंडलूम के व्यवसाय में जुड़ी हुई हैं।
अंतरराष्ट्रीय सूरजकुंड मेले में उन्होंने पहली बार स्टाल लगाई है। वह इससे पहले दुबई इंटरनेशनल फेयर में स्टाल लगा चुकी है।
भारत देश की सभ्यता एवं संस्कृति से प्रभावित शहला कहती है कि अफगानिस्तान में करीब 27 करोड़ की आबादी आपस में लड़ती रहती है, जबकि भारत में कितनी शांति है और यहां के नागरिक किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन में कोई दखल नहीं देते, चाहे वह किसी धर्म या जाति का हो।
पांचों वक्त नमाज अता करने वाली शहला सादत का कहना है कि इस्लाम एक शांतिप्रिय धर्म है, किंतु जेहाद के नाम पर उसके धर्म की जालिम तस्वीर दुनिया के सामने प्रस्तुत की जा रही है।