फरीदाबाद। चावल बनाते वक्त निकलने वाले पानी को हम अकसर व्यर्थ समझकर फेंक देते हैं, लेकिन राजस्थान के कारीगर इससे कागज बनाते हैं फिर प्राकृतिक रंगों और सोने-चांदी को पिघलाकर पेंटिंग में इस्तेमाल करते हैं। यह लगभग 400 साल पुरानी कारीगरी है। एक-एक पेंटिंग की कीमत एक लाख से अधिक है। खास बात यह है कि यह पेंटिंग सालों साल खराब नहीं होती हैं।
अंतरराष्ट्रीय सूरजकुंड मेले में स्टॉल नंबर 1064 पर मौजूद कारीगर हरिनारायण मरोटिया ने बताया कि यह कला उन्हें अपने पिता से विरासत में मिली है। हरिनारायण ने अपने पिता नाथू लाल से और उनके पिता ने अपने पिता मांगे लाल से यह हुनर सीखा है। साल 1998 में इस कला के लिए हरिनारायण मरोटिया को राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है। हरिनारायण मरोटिया अमेरिका, स्पेन, ब्राजील और कोलंबिया में अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं। कारीगर देवी-देवताओं और पशु पक्षियों का चित्र कागज पर उकेर रहे हैं। हरिनारायण की दो बेटियां मोनिका और ज्योत्सना तथा बेटा गौरव भी अब इसी कला से जुड़े हुए हैं। तीनों बच्चे इसे देश-दुनिया तक पहुंचाने में उनकी मदद कर रहे हैं।
पत्थरों से बनाते हैं रंग, फिर तैयार होती है पेंटिंग
हरिनारायण मरोटिया ने बताया कि चावल के पानी और व्यर्थ कागज को 24 घंटे के लिए भिगोकर रखा जाता है। फिर इसे बड़े रोलर से धीरे-धीरे समतल करते हैं, हाथ से बराकर करके धूप में सुखाया जाता है। इसके बाद पत्थरों और फलों सब्जियों से तैयार किए गए रंग का इस्तेमाल करके पेंटिंग तैयार की जाती हैं। इसके अलावा सोना और चांदी को पिघलाकर पेंटिंग में इस्तेमाल किया जाता है। पेंटिंग की कीमत कम से कम 500 से एक लाख और इससे अधिक है। पेंटिंग को तैयार करने में एक सप्ताह और महीना भी लग जाता है।
प्रशिक्षण भी दे रहे
हरिनारायण मरोटिया ने बताया कि राजस्थान में अधिकांश लोग पेंटिंग करने का काम करते हैं। इसलिए बच्चों को इस बारे में पहले से जानकारी होती है। बच्चों को इसकी बारीकियां सिखाने के लिए स्कूलों में प्रशिक्षण भी देते हैं। उन्होंने बताया कि महामारी के दौरान कारीगरों को आर्थिक तंगी से जूझना पड़ा लेकिन उन्होंने अपनी विरासत नहीं छोड़ी, जोकि आज भी उनकी पेंटिंग में नजर आ रही है। हालांकि मेले में इस बार इनकी कुछ खास बिक्री नहीं हुई, ऊंचाई पर स्टॉल होने के कारण कम पर्यटक पहुंच रहे हैं।