घर के अलावा समाज के लिए दिन रात एक करने में नहीं छोड़ती कसर
कैलाश गठवाल
फरीदाबाद। एक पढ़ा लिखा पुरुष एक घर का नाम रोशन करता है, लेकिन एक पढ़ी लिखी महिला दो घरों का गौरव होती है। ये बात शहर की उन महिलाओं पर सटीक बैठती हैं जो अपने घर के कामकाज के साथ ही शहर और समाज के लिए अपना योगदान दे रही हैं। अमर उजाला ने शहर की कुछ महिलाओं से बात की जो दूसरों की मदद के लिए दिन और रात में फर्क नहीं देखती। लाइम लाइट से दूर रहकर अपने काम के बलबूते शहर और कार्यस्थल पर पहचान बनाने वाली नायिकाएं अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत बनी हैं।
नार्मल डिलिवरी के लिए लगा देती हैं जी जान
बीके अस्पताल में पिछले दस साल को गायनी वार्ड में सेवा दे रही हूं। नार्मल डिलिवरी कराने के लिए कई बार जी जान लगाना पढ़ता है। केवल तभी आपरेशन करती हूंए जब बात उनके हाथ से निकल जाए। अनगिनत मामलों में नार्मल डिलिवरी करा चुकी हूं। इस कारण सरकारी अस्पताल पर लोगों का विश्वास बढ़ा है। बेटी पैदा होने पर कई बार महिलाएं मायूस होती हैं तो हम उन्हें अपना उदाहरण देकर बेटी को पढ़ाने की बात समझाती हैं।
- डॉ. अरूणा गोयल, बीके अस्पताल
न्याय दिलाने के लिए अदालत में महिलाओं की ढाल
मेरे पास ज्यादातर महिलाओं से संबंधित केस आते हैं। घर व समाज के प्रताड़ित होने के बाद महिलाओं को अदालत ही आखिरी सहारा लगता है। लीगल एड की सदस्य होने के नाते मैं दुष्कर्म जैसे मामलों में देर रात भी बयान लेने के लिए घर से निकल जाती हूं। ज्यादातर केसों में मैंने आपसी सहमति के महिलाओं को तलाक की नौबत को टालते हुए महिलाओं के घर बसाने में मदद की है।
-मनमीत कौर- फैमिली कोर्ट की अधिवक्ता
काउंसलिंग के जरिए बच्चों को अपराध से बचा रहीं
मेरे सामने वे मामले आते हैं जो अनजाने में अपराध कर बैठते हैं या जो खुद अपराध के शिकार हो जाते हैं। सही मार्गदर्शन न मिलने पर बच्चों को सही न्याय नहीं मिल पाता है। कई बार देर रात को भी केस आ जाते हैं, जिसमें बच्चे की काउंसलिंग कर उनके साथ हुए अपराध के बारे में जानना होता है। अदालत में जाकर बच्चे को न्याय दिलाने के लिए कई बार घर के काम भी छोड़ने पड़ते हैं।
- अपर्णा, काउंसलर - जिला बाल संरक्षण इकाई
लोगों के लिए मिसाल बनी पैरा एथलीट कंचन लखानी
ग्रेटर फरीदाबाद स्थित सेक्टर-85 निवासी कंचन लखानी उन लोगों के लिए मिसाल हैं, जो जरा-सी तकलीफ में भी घबरा जाते हैं। कंचन बताती हैं कि अन्य लोगों की तरह मैं खुशहाल जिंदगी बिता रही थी। 4 सितंबर 2008 को हुए एक हादसे ने अचानक मेरी जिंदगी बदल कर रख दी। एक रेल हादसे में मेरा हाथ कट गया और स्पाइनल इंजरी के चलते कमर से नीचे के हिस्से ने काम करना बंद कर दिया। इसके बाद मैं निराशा में डूब गई, मन में आत्महत्या करने के खयाल आने लगे। फिर मैंने अपने अवसाद से बाहर निकलकर अपनी तकदीर खुद लिखने का फैसला कर लिया। कड़े परिश्रम के बाद राष्ट्रीय स्तर की पैरा ऐथलीट बनकर 2017 में राष्ट्रीय पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में तीन स्वर्ण पदक जीते।
पुलिस की नौकरी में समय की बाधा नहीं देखी जाती। नौकरी के लिए घर के काम कई बार कैंसिल करने पड़ते हैं। महिलाओं को आगे बढ़ाने में पुरूषों और परिवार का भी योगदान होता है। परिवार सहयोग करें तो महिला देश और समाज के लिए और बेहतर परिणाम सामने ला सकती हैं। महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए हम एक फोन पर हमेशा तैयार हैं। - मोनिका देशवाल- एसीपी क्राइम अगेंस्ट वूमन