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Faridabad News: 190 एमएलडी अपशिष्ट नहीं हो रहा शोधित, यमुना में पहुंच रहा जहरीला पानी

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कैग रिपोर्ट: 84.82 करोड़ की सीवरेज परियोजना वन मंजूरी के इंतजार में पांच साल से अधिक अटकी
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196.55 करोड़ के दो एसटीपी भी कनेक्टिविटी के अभाव में बेकार
अमर उजाला ब्यूरो
फरीदाबाद। औद्योगिक नगरी फरीदाबाद में अपशिष्ट जल शोधन व्यवस्था सरकारी विभागों की लापरवाही और आपसी तालमेल की कमी से शहर के लोगों के साथ-साथ यमुना को भी भुगतना पड़ रहा है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में सामने आया है कि शहर में प्रतिदिन पैदा होने वाले घरेलू सीवेज और उसके उपचार की क्षमता के बीच भारी अंतर है। फरीदाबाद में 282 एमएलडी घरेलू अपशिष्ट जल पैदा होता है। जबकि 97.5 एमएलडी ही शोधित हो सका है।
इस तरह करीब 190 एमएलडी सीवेज का उपचार नहीं हो पा रहा था। ऑडिट रिपोर्ट में बताया गया है कि शहर से छह प्रमुख नाले यमुना नदी की ओर जाते हैं। इन नालों के माध्यम से जाने वाले प्रदूषित पानी का सीधा असर यमुना पर पड़ रहा है। सबसे चिंताजनक स्थिति बुढ़िया नाले के जरिए यमुना में पहुंचने वाले पानी की गुणवत्ता को लेकर सामने आई है। वर्ष 2024 में बूढ़िया नाले से यमुना में जाने वाले पानी में औसत बीओडी 139 मिलीग्राम प्रति लीटर दर्ज किया गया। इसके मुकाबले निर्धारित मानक महज 10 मिलीग्राम प्रति लीटर है। यानी पानी में जैविक प्रदूषण का स्तर तय सीमा से करीब 14 गुना रहा। इसी तरह पानी में फीकल कोलीफॉर्म का औसत स्तर 7,891 एमपीएन/100 एमएल पाया गया, जबकि निर्धारित मानक 100 एमपीएन/100 एमएल है। यह आंकड़ा बताता है कि अपशिष्ट जल के पर्याप्त शोधन के बिना नालों में छोड़े जाने से यमुना में प्रदूषण का गंभीर खतरा बना हुआ है।
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कैग के अनुसार जिले में कुल पांच एसटीपी हैं। इनमें से चार एसटीपी अपशिष्ट जल निकासी के निर्धारित मानकों को पूरा कर रहे थे। इसके बावजूद उपचार क्षमता पर्याप्त नहीं होने के कारण बड़ी मात्रा में शोधित नहीं हो पा रहा था।

84.82 करोड़ की परियोजना, पांच साल से ज्यादा की देरी:
कैग ने फरीदाबाद नगर निगम की सीवरेज व्यवस्था बढ़ाने के लिए शुरू की गई एक बड़ी परियोजना में भी गंभीर खामियां पकड़ी हैं। सितंबर 2018 में दो मुख्य पंपिंग स्टेशन (एमपीएस) और मुख्य कनेक्टिंग सीवर लाइन के निर्माण तथा पांच साल के संचालन एवं रखरखाव का काम 84.82 करोड़ रुपये में एक कंपनी को दिया गया था। परियोजना को 18 महीने में यानी मार्च 2020 तक पूरा किया जाना था।
लेकिन नगर निगम ने वन भूमि के डायवर्जन की मंजूरी लेने की प्रक्रिया समय पर शुरू नहीं की।। मुख्य कनेक्टिंग सीवर लाइन नहीं बनने के कारण दोनों पंपिंग स्टेशनों को इस्तेमाल में नहीं लाया जा सका। इस परियोजना से जुड़ी सबसे बड़ी विडंबना यह है कि मिर्जापुर में 80 एमएलडी और प्रतापगढ़ में 100 एमएलडी क्षमता के एसटीपी भी मार्च 2024 में बनकर तैयार हो गए। इन दोनों एसटीपी के निर्माण पर दूसरी कंपनी को करीब 196.55 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया। लेकिन मुख्य सीवर लाइन और पंपिंग स्टेशन की कनेक्टिविटी नहीं होने के कारण तैयार एसटीपी भी उपयोग में नहीं आ सके।

सात साल बाद भी तीन सीईटीपी का इंतजार:
प्रदेश सरकार ने जुलाई 2018 में औद्योगिक अपशिष्ट जल के उपचार के लिए दो सीईटीपी बनाने की योजना बनाई थी। इनकी क्षमता पहले 18.5 एमएलडी और छह एमएलडी रखी गई थी। बाद में मिर्जापुर में 25 एमएलडी का एक और सीईटीपी प्रस्तावित किया गया तथा पहले प्रस्तावित दोनों सीईटीपी की क्षमता बढ़ाकर 50 एमएलडी और 15 एमएलडी कर दी गई।
तीनों सीईटीपी के लिए हरियाणा राज्य औद्योगिक एवं आधारभूत संरचना विकास निगम (एचएसआईआईडीसी) ने 539 करोड़ रुपये की डीपीआर तैयार की। लेकिन जमीन, संचालन और रखरखाव तथा सीवरेज शुल्क की वसूली जैसे मुद्दों पर विभागों के बीच सहमति नहीं बन सकी।
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अगस्त 2020 में वित्त विभाग ने निर्णय लिया कि इन सीईटीपी का निर्माण नगर निगम करेगा। इसके बावजूद अक्टूबर 2022 तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद तैयार डीपीआर में परियोजना की कुल लागत बढ़कर 824.60 करोड़ रुपये हो गई।
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