फरीदाबाद पशुपालन विभाग में स्टाफ कमी होने के कारण दो साल पहले खरीदी गई एंबुलेंस सड़क पर नहीं उतर पाई है। यह गाड़ी अस्पताल परिसर में खड़ी रहती है।
यही नहीं सरकार उक्त वाहनों का इंश्योरेंस भी अदा कर रही है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब विभाग के पास कर्मचारियों की कमी थी तो एंबुलेंस क्यों दी गई?
ज्ञात हो कि वर्ष 2013 में हुड्डा सरकार ने गरीब पशुपालकों के घर जाकर पशुओं का इलाज करने के लिए पशुपालन विभाग को एंबुलेंस की सुविधाएं दी थीं। करोड़ों रुपये खर्च कर प्रदेश के 21 जिलों में मोबाइल क्लीनिक एंबुलेंस खरीदी गई थी। इसके लिए सरकार ने कंपनी को करीब चार करोड़ रुपये का भुगतान किया।
उसके बाद इन मोबाइल क्लीनिक में मशीनें और अन्य जरूरी उपकरण लगवाने के लिए गुड़गांव भेजा गया। उसमें करीब दो लाख रुपये प्रति एंबुलेंस का खर्च अलग से आया। इन सबके बावजूद अधिकारियों की अनदेखी के कारण ये एंबुलेंस 21 जिलों में से एक भी जिले में सड़कों पर नहीं उतर सकीं।
पशुपालकों के घर जाकर इलाज करने की तो बात तो दूर की है। मोबाइल क्लीनिक एंबुलेंस को घर बुलाने के लिए विभाग की ओर से कोई हेल्पलाइन नंबर भी नहीं जारी किया गया है। यही नहीं किसी पशुपालक को इसकी जानकारी भी नहीं है।
मोबाइल क्लीनिक में सुविधा
मोबाइल क्लीनिक को शुरू करने का उद्देश्य यह था कि जो अपने पशुओं को अस्पताल नहीं ला सकते थे, उनके घर पर पहुंच कर इलाज करना था। इसके अंदर एक्स-रे, अल्ट्रासांउड सहित अन्य बीमारियों का इलाज करने के लिए मददगार साबित होती।
-विभाग में भ्रष्टाचार का बोलबाला है। उच्चाधिकारियों को पहले से पता था कि विभाग में कर्मचारियों की खासी कमी है। इसके बावजूद विभाग ने सरकार को प्रस्ताव बना कर भेजा और गाड़ियां खरीदी र्गइं। न तो समय पर मशीनें लगवाई गईं और न ही इनके लिए ड्राइवर, डॉक्टर और कंपाउडर की भर्तियां की गईं। इसी कारण प्रदेश के 21 जिलों में एंबुलेंस सिर्फ अस्पताल परिसर की शोभा बढ़ा रही हैं।-राजबेल देशवाल, केंद्रीय कमेटी सदस्य हरियाणा डिप्लोमा वैटनरी