रेल बजट को लेकर कॉलेज की छात्राओं में भी उत्सुकता है। वे किराया कम करने के साथ ही ट्रेनों के बीच अंतराल को कम देखना चाहती हैं। उन्होंने महिला सुरक्षा को अहम मुद्दा बनाया है।
हेल्पलाइन नंबरों के प्रति जागरूकता अभियान चलाने की बात भी वे इस बजट में चाहती हैं। अमर उजाला से बातचीत पर आधारित रिपोर्ट...
फरीदाबाद की रहने वाली रीटा का कहना है कि ओल्ड, बाटा स्टेशन के शौचालय का हाल देखिए। इतनी गंदगी है कि उसमें प्रवेश करने का मन नहीं करता। यहां पीने का पानी नहीं मिलता। ट्रेन देरी से आती है।
टिकट काउंटर पर एक ही व्यक्ति टिकट देता है और उसकी स्पीड भी इतनी कम होती है कि जब तक वह टिकट देता है, तब तक ट्रेन छूट जाती है। यहां स्टाफ की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए।
यहां के डीएवी कॉलेज में पढ़ने वाली दिल्ली निवासी शिवानी का कहना है कि दिल्ली से ईएमयू 11:30 बजे चलती है। इसके बाद अगली ईएमयू शाम को ही मिलती है। दो ट्रेनों के बीच इतना लंबा अंतराल नहीं होना चाहिए।
इनकी संख्या बढ़ाई जाए, ताकि लोग समय पर अपने घर पहुंच सकें। एक ट्रेन छूटने पर बस या ऑटो से अधिक किराया खर्च कर पहुंचना पड़ता है।
पलवल निवासी और डीएवी कॉलेज में पढ़ने वाली आशु को शिकायत है कि बजट में हर साल नई योजनाएं जोड़ी जाती हैं, लेकिन पुरानी योजनाएं कितनी सफल हुईं, इस ओर रेलवे का ध्यान नहीं होता।
यात्री को देरी से आने वाली ट्रेनों के कारण परेशानी झेलनी पड़ती है। लेट ट्रेन का इंतजार यात्री दस से पंद्रह मिनट तक कर सकता है, लेकिन दस घंटे की देरी रिजर्वेशन वालों के लिए भारी पड़ जाती है।
एसजीएम नगर निवासी दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा शिखा का कहना है कि रेल बजट में महिला सुरक्षा अहम मुद्दा होना चाहिए। सुरक्षा के लिए जो हेल्पलाइन नंबर जारी किए हैं, वह ट्रेन के हर कोने में लिखे हों।
महिला डिब्बे में पुरुषों को चढ़ने न दिया जाए। डिब्बों में महिला सुरक्षा गार्ड की व्यवस्था होती है, लेकिन यात्रा के दौरान कभी वह दिखाई नहीं देतीं।