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विधायकी छिनते ही रुतबा गायब, खड़ी हो गई गाड़ी

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सांसद और विधायक बनकर करोड़ों और अरबों जमा करने वाले देश में कई उदाहरण हैं, मगर ऐसे विरले मिलेंगे जिन्होंने इस पद पर रहने के बावजूद अपने या अपने परिवार के लिए कुछ इकट्ठा नहीं किया।
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ऐसे ही लोगों में हैं गुड़गांव जिले के पटौदी विधानसभा क्षेत्र से एक महीना पहले तक विधायक रहे गंगाराम। बेहद सरल स्वभाव एवं सादा जीवन बिताने वाले इस शख्स का बेटा नौकरी के अभाव में सवारियां ढोने वाला टैंपू चलाता है।

वह खुद 997 रुपये की पेंशन पर निर्भर हैं। उनके घर के बाहर बोलेरो गाड़ी इसलिए खड़ी है कि विधायकी जाने के बाद उनके ईंधन के लिए इनके पास पैसे नहीं हैं।

ये कैसा हाल हो गया?

गंगाराम वर्ष 2009 में इंडियन नेशनल लोकदल के टिकट पर पटौदी से विधायक चुने गए थे। मगर इस बार भाजपा की विमला देवी से शिकस्त खा गए। गंगाराम से बात कर कतई नहीं लगता है कि कुछ दिनों पहले तक वह विधायक थे। पटौदी के भौड़ाकलां में उनका पुश्तैनी मकान है।

इस गांव में वह एक 100 गज के प्लाट पर बने पुराने मकान में रहते हैं। बिना कलफ का सफेद कुर्ता पजामा पहनने वाले गंगाराम के पास बोलेरो गाड़ी विधायक रहते सरकार के सहयोग से मिली थी। विधायकी जाने के बाद यह घर के बाहर खड़ी है। बातचीत में वह खुद से सवाल करते हैं कि इसके ईंधन का खर्च अब कहां से आएगा।

इनके दो बेटे और एक बेटी है। सभी का विवाह हो चुका है। एक बेटा परचून की दुकान चलाता है, जबकि दूसरा सवारी ढोने वाला टैंपो। उन्होंने बताया कि बचपन में उनके दोनों बेटे पोलियो के शिकार हो गए थे। उनको लेकर वे इतने परेशान रहे कि अपने बच्चों को मैट्रिक से आगे नहीं पढ़ा सके।
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खुद नहीं चाहते थे बदनामी

वह खुद कॉपरेटिव बैंक में मैनेजर थे। 2003 में सेवानिवृत्त होने के बाद राजनीति में आ गए थे। अब बैंक से मिलने वाली 997 रुपये की पेंशन ही जीवन यापन का सहारा है। विधायकी जाने के बाद मिलने वाली मदद अब तक उन्हें नहीं मिली है।

विधायक रहते अपने बेटों को सरकारी नौकरी नहीं दिला पाने के बारे में बताते हैं कि तब तक उनकी उम्र निकल चुकी थी। वह कहते हैं कि बच्चों को ठेका-पट्टा इसलिए नहीं दिलवाया कि वह किसी तरह की बदनामी नहीं चाहते थे।

अपने पिता की सादगी पर बच्चों को भी कोई अफसोस नहीं। बड़े लड़के नरेंद्र गर्व से कहते हैं कि उनके पिता की साफ-सुथरी छवि ही उनके लिए बड़ी दौलत है।

गंगाराम ने 'अमर उजाला' से बातचीत में कहा कि चुनाव हारने के बाद भी उनके हौसले पस्त नहीं हुए हैं। चुनाव परिणाम आने के अगले दिन से ही लोगों के बीच पहुंचकर उनकी समस्याएं जानने और अधिकारियों तक पहुंचाने में लग गए हैं।
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