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अंतिम संस्कार के लिए हर साल कटते हैं 600 लाख पेड़

Sat, 08 Nov 2014 01:53 AM IST
अमर उजाला, गाजियाबाद
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गंगा और पर्यावरण प्रदूषण में इसके किनारे बने शवदाह गृह बड़ा कारण हैं। अंतिम संस्कार में हर साल 600 लाख से ज्यादा पेड़ों की लकड़ियां प्रयोग में लाई जाती हैं। इनमें शवों को जलाने से पर्यावरण के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन होता है।
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गंगा में आठ लाख टन राख प्रवाहित की जाती है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि इस पर तत्काल रोक लगाकर शवदाह की प्रक्रिया नहीं बदली गई तो उत्तराखंड जैसी त्रासदी के रूप में प्रकृति बदला लेगी।

पर्यावरण के लिए ग्रीन हाउस गैसें खतरा बन रही हैं। वातावरण में इनका स्तर साल दर साल बढ़ रहा है। इनके साथ ही गंगा में बढ़ते प्रदूषण के चलते विशेष सुधार अभियान चलाया जा रहा है। पेड़ों की कमी से प्रदूषण बढ़ रहा है।
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मोक्षदा पर्यावरण एवं वन सुरक्षा समिति 1992 से गंगा किनारे सामान्य प्रक्रिया से शव दहन न करने की अपील करते हुए अभियान चला रही है। जिले में इस संस्था को जीडीए की देखरेख में चलाया जा रहा है।

संस्था केपदाधिकारी डा. एमएम केसरवानी ने बताया कि हरित शवदाह प्रणाली से शवों का अंतिम संस्कार करके आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ वातावरण दे सकते हैं।

सामान्य विधि में शव दाह करने में जहां 500 किलो लकड़ी खर्च होती है, वहीं हरित शव दाह प्रणाली में मात्र 100 किलोग्राम लकड़ी से शवदाह हो जाता है।

विद्युत शवदाह गृह का प्रयोग न करने वाले व्यक्ति हरित प्रणाली के शवदाह गृह में अंतिम संस्कार करके पर्यावरण रक्षा में सहयोग किया जा सकता है। देश में इस प्रणाली के 26 शवदाह गृह हैं।

इनमें से गाजियाबाद में दो हैं, इन पर 120 शवों का संस्कार हर महीने किया जाता है। इस प्रणाली के लिए लोगों को जागरूक करने के लिए 11 नवंबर को कविनगर में गोष्ठी आयोजित की जाएगी।
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