न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर और न्यायमूर्ति ओम प्रकाश शुक्ला की डिवीजन बेंच ने फैसले में कहा कि दिव्यांगता लाभ और न्यूनतम मजदूरी दो अलग-अलग कानूनों के तहत अलग-अलग उद्देश्यों के लिए हैं। न्यूनतम मजदूरी नौकरी के दौरान काम के बदले मिलती है जबकि पीडीबी दुर्घटना के कारण कमाई की क्षमता खोने की भरपाई है इसलिए इन्हें एक-दूसरे से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 1989 के बाद ईएसआई एक्ट से धारा 99 हटा दी गई थी जिसके तहत निगम खुद लाभ राशि बढ़ा सकता था। अब यह अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है।
राशि दो जून की रोटी के लिए पर्याप्त नहीं
कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए गहरी चिंता जताई कि इतनी कम राशि से दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से आती है। बेंच ने कहा कि हम स्थायी रूप से 100% दिव्यांग मुन्ना के दर्द को महसूस करते हैं। मौजूदा पीडीबी राशि किसी भी मानक से दो जून की रोटी के लिए भी पर्याप्त नहीं है। कोर्ट ने ईएसआईसी और श्रम मंत्रालय को निर्देश दिया कि हर दो साल में एक समिति गठित की जाए जो महंगाई, जीवनयापन की लागत और न्यूनतम मजदूरी सहित सभी पहलुओं को देखकर पीडीबी बढ़ाने की सिफारिश करे। कोर्ट ने कहा कि समिति सिर्फ न्यूनतम मजदूरी कानून से बंधी न रहे बल्कि स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से काम करे।
यह है मामला
25 जून 1989 को सावनी रबर इंडस्ट्रीज में काम करते समय मुन्ना के हाथ कट गए। ईएसआईसी ने 1990 में उन्हें 14 रुपये प्रतिदिन की दर से आजीवन पीडीबी दी जो समय-समय पर संशोधन के बाद भी अभी बहुत कम है (वर्तमान में करीब 49 रुपये प्रतिदिन)। वर्ष 1999 में कंपनी ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया था। लेबर कोर्ट ने निकाले जाना वैध बताया था लेकिन हाईकोर्ट की सिंगल बेंच और फिर डिवीजन बेंच ने मुआवजे के रूप में 2 लाख रुपये दिए थे क्योंकि कंपनी बंद हो गई थी। 2016 में डिवीजन बेंच ने ईएसआईसी को निर्देश दिया था कि लाभ राशि कम से कम न्यूनतम मजदूरी के करीब हो लेकिन ईएसआईसी ने नियमों का हवाला देकर इनकार कर दिया था।