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Election: छात्रसंघ चुनाव की पांच हजार खर्च सीमा, प्रत्याशी बहा रहे करोड़ों

Mon, 16 Sep 2024 12:29 PM IST
निकिता गुप्ता अमर उजाला नेटवर्क, दिल्ली

सार

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में आधिकारिक खर्च सीमा पांच हजार तय होने के बावजूद प्रत्याशी करोड़ों रुपये खर्च कर रहे हैं।
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दिल्ली विश्वविद्यालय, Delhi University - फोटो : University Of Delhi
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विस्तार
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दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) में छात्रसंघ चुनाव का शंखनाद हो चुका है। डीयू ने इन चुनावों की खर्च सीमा तय कर कौड़ी का बनाया हुआ है, लेकिन प्रत्याशी इसे करोड़ों का बना 

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रहे हैं। चुनाव जीतने के लिए छात्र संगठन व भावी प्रत्याशी ना  केवल पसीना बल्कि पैसा भी जमकर बहा रहे हैं।  नामांकन से पहले ही भावी प्रत्याशियों की ओर से लाखों रुपये खर्च करने की शुरूआत हो चुकी है जबकि एक उम्मीदवार के लिए चुनावी खर्च सीमा पांच हजार रुपये तय है। इसकी बानगी कैंपस व कैंपस के बाहर महंगी गाड़ियों के साथ प्रचार में देखने मिल रही है। हालांकि, ज्यादातर छात्रों और छात्र संगठनों का मानना है कि पांच हजार रुपये की खर्च सीमा बिल्कुल भी व्यावहारिक नहीं है।

टिकट मिलने के बाद छात्रों को लुभाने के लिए डायरी, पेन, फिल्म का फ्री टिकट व मनोरंजन पार्क की यात्रा के ऑफर दिए जाएंगे। रोचक तथ्य यह है कि लाखों-करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी उम्मीदवार अपनी खर्च सीमा पांच हजार रुपये ही दिखाएंगे। तर्क यह दिया जाएगा कि समर्थकों ने यह पैसे खर्च किए हैं। लिंगदोह कमेटी की सिफारिशें प्रत्याशियों के लिए होती हैं, समर्थकों के लिए नहीं।
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डूसू से पचास से अधिक डीयू के कॉलेज जुड़े हुए हैं। कैंपस नॉर्थ व साउथ में बंटा है जबकि कुछ कॉलेज बाहरी दिल्ली में भी है। ऐसे में कैंपस व कॉलेजों में छात्रों को लुभाने और अपना दमखम दिखाने के लिए प्रत्याशी बड़ी-बड़ी महंगी गाड़ियों का इस्तेमाल करते हैं। गाड़ियों का यह काफिला इन दिनों कैंपस में व सड़कों पर खूब देखने को मिल रहा है। नामांकन से पहले ही पोस्टर, बैनर से प्रचार शुरू हो चुका है। जबकि टिकट मिलने के बाद सोशल मीडिया और अन्य हाईटेक तरीकों का इस्तेमाल किया जाएगा। इन सबके लिए किसी न किसी तरह पैसा बहाना पड़ेगा। कमाल की बात यह है तय सीमा से ज्यादा खर्च करने के बाद भी प्रत्याशी चुनाव खर्च पांच हजार रुपये ही दिखाएंगे।

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एबीवीपी के दिल्ली प्रदेश मंत्री हर्ष अत्री ने कहते हैं कि डूसू से जुड़े 52 कॉलेज हैं जिनके करीब डेढ़ लाख वोटर हो जाते हैं। पांच हजार रुपये खर्च सीमा की समीक्षा की जानी चाहिए क्योंकि यह वर्तमान समय के हिसाब से व्यावहारिक नहीं है। जिस समय लिंगदोह कमेटी की सिफारिशें आई थी तब हो सकता है कि वह खर्च सीमा व्यावहारिक रही हो। यदि एक प्रत्याशी मेट्रो से भी एक कॉलेज से दूसरे कॉलेज दस दिन प्रचार के लिए जाएगा तो उसके 100 रुपये आने जाने के हिसाब से एक हजार रुपये इसी में खर्च हो जाएंगे। डीयू को पूर्व डूसू पदाधिकारियों से बात करके इसमें समीक्षा करने की आवश्यकता है।

छात्र संगठनों की मानें तो उम्मीदवार बनने के बाद एक दिन का खर्च ही बीस हजार से ऊपर चला जाता है। भले ही हस्तलिखित पोस्टर व पर्चे बांटे जाते हैं, लेकिन डेढ़ लाख वोटरों तक पहुंच बनाने के लिए उसमें भी खर्च होता है। छात्र संगठनों का कहना है कि यदि प्रत्याशी आचार संहिता का ईमानदारी से पालन करते हुए भी प्रचार करें तो एक दिन का खर्च ही कुल चुनाव खर्च सीमा से ऊपर चला जाएगा।

कैंपस में कई जगहों पर हजारों-लाखों रुपयों के बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगे हैं। डायरी, पेन और अन्य सामान कॉलेजों में बांटना शुरू कर दिया गया है। अंतिम समय में तो छात्रों को अपने पक्ष में करने के लिए फिल्म के टिकट व मनोरंजन पार्क ले जाने के ऑफर दिए जाएंगे। प्रत्याशी अपने चुनाव खर्च में इन खर्चों को शामिल नहीं करते है बल्कि उनके साथ के समर्थक पैसा खर्च करते हैं। चाहे वह खाने पीने का खर्च हो या प्रचार पर। इस तरह आधिकारिक तौर पर चुनाव पांच हजार का ही रहता है, लेकिन हकीकत में करोड़ों खर्च हो चुके 
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