एबीवीपी के दिल्ली प्रदेश मंत्री हर्ष अत्री ने कहते हैं कि डूसू से जुड़े 52 कॉलेज हैं जिनके करीब डेढ़ लाख वोटर हो जाते हैं। पांच हजार रुपये खर्च सीमा की समीक्षा की जानी चाहिए क्योंकि यह वर्तमान समय के हिसाब से व्यावहारिक नहीं है। जिस समय लिंगदोह कमेटी की सिफारिशें आई थी तब हो सकता है कि वह खर्च सीमा व्यावहारिक रही हो। यदि एक प्रत्याशी मेट्रो से भी एक कॉलेज से दूसरे कॉलेज दस दिन प्रचार के लिए जाएगा तो उसके 100 रुपये आने जाने के हिसाब से एक हजार रुपये इसी में खर्च हो जाएंगे। डीयू को पूर्व डूसू पदाधिकारियों से बात करके इसमें समीक्षा करने की आवश्यकता है।
छात्र संगठनों की मानें तो उम्मीदवार बनने के बाद एक दिन का खर्च ही बीस हजार से ऊपर चला जाता है। भले ही हस्तलिखित पोस्टर व पर्चे बांटे जाते हैं, लेकिन डेढ़ लाख वोटरों तक पहुंच बनाने के लिए उसमें भी खर्च होता है। छात्र संगठनों का कहना है कि यदि प्रत्याशी आचार संहिता का ईमानदारी से पालन करते हुए भी प्रचार करें तो एक दिन का खर्च ही कुल चुनाव खर्च सीमा से ऊपर चला जाएगा।
कैंपस में कई जगहों पर हजारों-लाखों रुपयों के बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगे हैं। डायरी, पेन और अन्य सामान कॉलेजों में बांटना शुरू कर दिया गया है। अंतिम समय में तो छात्रों को अपने पक्ष में करने के लिए फिल्म के टिकट व मनोरंजन पार्क ले जाने के ऑफर दिए जाएंगे। प्रत्याशी अपने चुनाव खर्च में इन खर्चों को शामिल नहीं करते है बल्कि उनके साथ के समर्थक पैसा खर्च करते हैं। चाहे वह खाने पीने का खर्च हो या प्रचार पर। इस तरह आधिकारिक तौर पर चुनाव पांच हजार का ही रहता है, लेकिन हकीकत में करोड़ों खर्च हो चुके