सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई जांच के बीच कार्रवाई तेज, नोएडा में सेक्टर-63 और सेक्टर-122 स्थित ठिकानों पर पहुंचीं टीमें
माई सिटी रिपोर्टर
नोएडा। फ्लैट पर कब्जा मिलने तक बैंक की किश्त बिल्डर द्वारा चुकाने के वादे वाली सबवेंशन स्कीम में फर्जीवाड़े की जांच अब प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) तक पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की जांच के बीच ईडी ने शुक्रवार को दो बिल्डरों से जुड़े ठिकानों पर छापे मारे। एक ठिकाना सेक्टर-63 स्थित कार्यालय है, जबकि दूसरे बिल्डर से जुड़ा ठिकाना सेक्टर-122 में बताया जा रहा है। टीमें देर शाम तक शहर में मौजूद रहीं। हालांकि, ईडी की ओर से छापे के दौरान जांच या किसी बरामदगी की आधिकारिक जानकारी साझा नहीं की गई।
ईडी की कार्रवाई एवीजे डेवलपर्स और रुद्र बिल्डवेल बिल्डर से जुड़े ठिकानों पर हुई। दोनों बिल्डरों ने सबवेंशन स्कीम के तहत फ्लैट लॉन्च किए थे। हालांकि, इनकी संबंधित परियोजनाएं नोएडा में नहीं हैं। दूसरी ओर, सीबीआई ने जुलाई 2025 में नोएडा की 10 परियोजनाओं को लेकर प्राथमिकी दर्ज की थी। इन मामलों में जांच आगे बढ़ने के साथ चार्जशीट दाखिल करने की प्रक्रिया भी चल रही है।
सीबीआई की जांच में फंड डायवर्जन समेत कई अनियमितताएं सामने आने के बाद अब ईडी की जांच से संबंधित बिल्डरों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। मामले में कुछ बैंक अधिकारी भी जांच के दायरे में हैं। सुप्रीम कोर्ट इस तरह की सबवेंशन स्कीम पर टिप्पणी करते हुए कह चुका है कि इसमें फ्लैट खरीदारों को बंधक जैसी स्थिति में डाल दिया गया।
सबवेंशन स्कीम : फ्लैट पर कब्जा मिलने तक होम लोन की किस्त चुकाने का वादा कर फंसाया
ग्रुप हाउसिंग परियोजनाओं को बढ़ावा देने के लिए बिल्डर और बैंकों ने मिलकर सबवेंशन स्कीम शुरू की थी। इसमें बिल्डर खरीदार से वादा करता था कि फ्लैट पर कब्जा मिलने तक होम लोन की किस्त वही चुकाएगा। कब्जा मिलने के बाद किस्त की जिम्मेदारी खरीदार की होती थी। इसके लिए बैंक, बिल्डर और खरीदार के बीच त्रिपक्षीय समझौते के आधार पर लोन कराया जाता था।
-आमतौर पर खरीदार करीब 10 प्रतिशत राशि बिल्डर को देता था, जबकि शेष रकम का लोन बैंक से मंजूर होकर एकमुश्त बिल्डर को मिल जाता था। आरोप है कि कई बिल्डरों ने लोन की रकम हासिल करने के बाद शुरुआत में कुछ किस्तें जमा कीं, लेकिन बाद में भुगतान बंद कर दिया।
-परियोजनाएं भी समय पर पूरी नहीं हुईं। किस्तें नहीं चुकाने पर बैंकों ने खरीदारों को नोटिस भेजने शुरू कर दिए। कई खरीदार बैंक और बिल्डर के चक्कर लगाने को मजबूर हुए और कुछ बैंक डिफाॅल्टर बन गए। कई मामलों में आरसी तक जारी हुईं। आरबीआई के इसे पोंजी स्कीम की तरह बताने के बाद ऐसी योजनाओं पर रोक लगी।