उन्होंने कहा कि अदालत केवल यह देख सकती है कि गिरफ्तारी के लिए कोई सामग्री है या नहीं, न कि यह कि क्या सामग्री है। इस मामले में, सामग्री को ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट की ओर से देखा गया है। हाईकोर्ट ने मामले की फाइलें तलब की थीं और सामग्री का अवलोकन किया था। मेहता ने कहा कि अगर अदालत रिमांड चरण में हस्तक्षेप करना शुरू कर देती है तो यह शक्तिशाली लोगों के लिए आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना सीधे शीर्ष अदालत से संपर्क करने के दरवाजे खोल देगी। पीएमएलए की धारा 19 के तहत कुछ अंतर्निहित सुरक्षा उपाय प्रदान किए गए हैं, जो ईडी अधिकारी की गिरफ्तारी की शक्तियों से संबंधित है। गिरफ्तारी का प्रावधान जितना अधिक कठोर होगा, अदालतों की ओर से समीक्षा उतनी ही कम होगी।
धारा 19 की शर्तों के उल्लंघन पर अदालतें कर सकती हैं हस्तक्षेप : पीठ
हालांकि, पीठ मेहता की दलील से सहमत नहीं हुई और कहा कि अगर धारा 19 की शर्तों का उल्लंघन होता है तो अदालतें हस्तक्षेप कर सकती हैं। पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गई हैं और इस अदालत ने गिरफ्तारी को रद्द कर दिया है या जमानत दे दी है। हां, उपाय को खारिज नहीं किया जा सकता है और रिमांड कोर्ट या हाईकोर्ट आमतौर पर इन पहलुओं पर गौर करते हैं। ऐसा नहीं है कि हमारे पास अधिकार क्षेत्र नहीं है, लेकिन आम तौर पर हम न्यायिक संयम का पालन करते हैं, क्योंकि वैकल्पिक उपाय उपलब्ध हैं। हालांकि, जब कोई गंभीर मामला हो तो हम उसे नजरअंदाज नहीं कर सकते।
दिनभर चलती रही मामले की सुनवाई
करीब दिनभर चली सुनवाई के दौरान पीठ ने केजरीवाल को गिरफ्तार करने के लिए अपनाई गई प्रक्रिया पर ईडी से पूछताछ की और आश्चर्य जताया कि जांच अधिकारी गिरफ्तार करने की शक्ति का प्रयोग करते समय उनके पक्ष में दोषमुक्ति संबंधी सामग्रियों को कैसे नजरअंदाज कर सकते हैं।