किसान आंदोलन में शामिल होने वाली महिलाओं की सुविधा के लिए सिंघु बॉर्डर पर इको फ्रैंडली ट्रॉयलेट(ड्राई टॉयलेट) बनाए गए हैं। खास बात यह है कि इसके लिए न तो अधिक सीमेंट और न ही ईंट की जरूरत पड़ी। इन्हें प्लास्टिक की बोतलों और दूसरे उत्पादों को रिसाइकिल कर तैयार किया गया है।
इस टॉयलेट से न तो इंफेक्शन का अधिक खतरा है और न ही सीवेज की चिंता। पराली, लकड़ी के बुरादे से छह फुट का गड्ढा बनाया गया है ताकि आंदोलन के समर्थन में पहुंची महिलाओं को किसी तरह की तकलीफ न आए।
एक स्वयंसेवी संस्था चलाने वाले सहज उमंग सिंह ने बताया कि इसके लिए न तो फ्लश में 10-15 लीटर पानी की जरूरत होती है और न ही कोई और दूसरी चीज। पराली, लकड़ी के बुरादे को टॉयलेट के इस्तेमाल से पहले और बाद में डाला जाता है ताकि इससे गंदगी न फैले।
खास बात यह है कि कुछ दिनों में यह खुद ब खुद जैविक खाद में तब्दील हो जाएंगे। इस्तेमाल के लिए पानी की सुविधा है जबकि रात के वक्त रोशनी के लिए पारदर्शी छत बनाया गया है ताकि स्ट्रीट लाइट की रोशन में दिक्कत न आए।
सहज उमंग सिंह ने बताया कि ड्राई टॉयलेट को बीबियां दी टॉयलेट का नाम दिया गया है। आंदोलन के समर्थन में पुरुषों के साथ साथ महिलाएं भी काफी संख्या में हैं। लेकिन टॉयलेट की कमी और परेशानियों को देखते हुए एक टॉयलेट फिलहाल तैयार किया है। इसमें प्लास्टिक की बोतलों को अधिकतर इस्तेमाल किया गया है। खास बात यह है कि जब इसकी जरूरत नहीं हो तो इसे हटाकर दूसरी जगह फिर इस्तेमाल में लाया जा सकता है।
तेल के पीपे से तैयार किया यूरीनल
हजारों की संख्या में पहुंचे लोग खुले में पेशाब न करें, इसके लिए तेल और घी के पीपे का इस्तेमाल में लाया जा रहा है। इसे तैयार करने के बाद चारों तरफ से हरे रंग की जाली से घेर दिया जाता है, ताकि आसानी से इस्तेमाल किया जा सके।