हरियाणा बनने के बाद से कांग्रेस पार्टी ने प्रदेश में काफी उतार चढ़ाव देखे हैं। इमरजेंसी के दौर में लगभग सफाए तक पहुंची तो बोफोर्स और मंडल कमंडल की मार से हाशिए पर आई। क्षेत्रीय दलों के सिर उठाने का खामियाजा भी इस पार्टी को भुगतना पड़ा।
बावजूद इसके पार्टी ने अपने जनाधार को मजबूती से थामे रखा। शायद यही वजह है कि गुजरे 48 वर्षों में सरकार जिस भी पार्टी की रही कांग्रेस की भूमिका प्रदेश की राजनीति में हमेशा बनी रही। पेश है हरियाणा में कांग्रेस पार्टी के राजनैतिक सफर और उतार चढ़ाव का इतिहास।
1966 में 81 विधानसभा क्षेत्र और विधायकों को लेकर अलग राज्य बने हरियाणा की सत्ता कांग्रेस ने ही संभाली थी। सत्ता की चाह और उठापटक की वजह से सिर्फ चार माह में ही पहले सीएम भगवत दयाल शर्मा को कुर्सी छोड़नी पड़ी। हालांकि विशाल हरियाणा पार्टी (वीएचपी) के राव विरेंद्र सिंह भी नौ माह से अधिक सरकार नहीं चला सके।
पंजाब से टूटकर बने हरियाणा की राजनीति यह दौर तोड़ फोड़ वाला रहा। वीएचपी छोड़ कर कांग्रेस में शामिल हुए उस समय के बड़े लीडर खुर्शीद, गयालाल, हीरालाल की वजह से 1968 के चुनाव में 48 विधायकों के साथ एक बार फिर कांग्रेस सत्ता में आई।