नंद नगरी पुलिस हिरासत में युवक की मौत मामले को हाईकोर्ट ने गंभीरता से लिया है। मंगलवार को न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल इस मामले में आदेश जारी देते हुए भावुक हो उठे। उनकी आंखें नम हो गईं और वह कुछ मिनट के लिए सीट छोड़कर कमरे में चले गए।
अदालत ने मामले में पुलिस को साफ निर्देश दिए हैं कि हत्याकांड के आरोपी पुलिसकर्मियों के खिलाफ जांच कर उन्हें जल्द निलंबित किया जाए। अदालत ने कहा कि पुलिस हिरासत में प्रताड़ना मानवता का खुला उल्लंघन है।
अदालत ने उपायुक्त क्राइम ब्रांच को अगली सुनवाई 17 नवंबर तक रिपोर्ट दायर करने के निर्देश दिए हैं। अदालत मृतक शाहनवाज की पत्नी राबिया उर्फ ममता की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उसने मामले की जांच एसआईटी से कराने व पांच करोड़ रुपये मुआवजा देने की मांग की है।
स्टेटस रिपोर्ट में किसी को नामजद नहीं किया गया।
सुनवाई शुरू होते ही याचिकाकर्ता राबिया की वकील ने कहा कि पुलिस द्वारा दायर स्टेटस रिपोर्ट में किसी को नामजद नहीं किया गया। पुलिस ने मामले में आरोपी पुलिसकर्मियों के खिलाफ अब तक कोई कार्रवाई नहीं की है।
वहीं, दिल्ली महिला आयोग की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एचएस फुल्का ने याचिका का समर्थन करते हुए कहा कि क्राइम ब्रांच ने 13 अक्तूबर जिस दिन याचिका दायर की गई, उसी दिन एफआईआर दर्ज की।
अब पुलिस ने बताया है कि क्राइम ब्रांच के एसीपी के नेतृत्व में एसआईटी का गठन कर दिया गया है, लेकिन अभी तक एफआईआर में किसी को नामजद नहीं किया गया है, जबकि मामला 7 सितंबर का है और ड्यूटी रोस्टर में उन सभी पुलिसकर्मियों की जानकारी है जो घटना के दिन मौजूद थे। अदालत ने कहा कि पुलिस हिरासत में मौत का मामला काफी गंभीर है।
वकील ने बोलीं जब ये लाइने
सुनवाई के दौरान अदालत ने कई नामी हस्तियों द्वारा कहीं पंक्तियों का जिक्र किया। अदालत ने जहां मशहूर शायर शकील बदायुनी की ..मेरा अजम इतना बुलंद है, कि पराये शोलों का डर नहीं।
मुझे खौफ आतिश-ए-गुल से है, ये कहीं चमन को जला न दें पढ़ी। राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के बयान दोहराए कि लोग असुरों व विभाजनकारी ताकतों को नष्ट करें।
हमने हमेशा से अनेकता को स्वीकारा है, सहिष्णुता को बढ़ावा दिया। अगर हम ऐसे नहीं रहते तो हमारी सभ्यता पांच हजार साल तक जीवित नहीं रहती। मानवता व बहुलतावदी सोच को किसी भी सूरत में हमें त्यागना नहीं चाहिए। अदालत ने रबिंद्रनाथ टैगोर, महात्मा गांधी आदि अन्य कई नामचीन लोगों द्वारा कहीं बातों का भी उदाहरण दिया।
फिर आमने-सामने वकील
मामले में एक बार फिर दिल्ली सरकार व उपराज्यपाल द्वारा नियुक्त वकील आमने-सामने आ गए। मामले में आरोपी पुलिसकर्मियों को बचाने के लिए दिल्ली पुलिस ने एक बार फिर उपराज्यपाल की अनुमति से सरकारी वकील की अपेक्षा मुख्य लोक अभियोजक शेलेंद्र बब्बर को पैरवी के लिए पेश किया।
सुनवाई के दौरान पुलिस ने बब्बर के जरिये अपनी रिपोर्ट अदालत के समक्ष पेश की। इस पर सरकार की तरफ से पेश सरकारी वकील ऋचा कपूर ने आपत्ति जताते हुए कहा कि न्यायमूर्ति आशुतोष पहले ही एक फैसले में स्पष्ट कर चुके हैं कि उपराज्यपाल मात्र एक पत्र के जरिये इस प्रकार किसी भी वकील को नियुक्त नहीं कर सकते।
उन्हें इस काम के लिए बाकायदा अधिसूचना जारी करनी होगी। उनका कहना था कि बब्बर ने उपराज्यपाल की तरफ से जो पत्र पेश किया है उसमें मात्र यह लिखा है कि वे कानूनी सहायता देंगे। यानी उनकी नियुुक्ति गैरकानूनी है। वहीं बब्बर ने कहा कि उसे दिल्ली पुलिस ने विशेष रूप से नियुक्त करवाया है।
यह है पूरा मामला
पेश याचिका में राबिया ने बताया कि गत 7 सितंबर को नंदनगरी इलाके में वह पति शाहनवाज के साथ बाइक पर अपने घर जा रही थी। इस दौरान शाहनवाज की परिचित फरहा को पुलिसकर्मी जिप्सी में बैठाकर थाने ले जा रहे थे। फरहा का अपने पति से झगड़ा हुआ था। फरहा ने शाहनवाज से मदद मांगी।
जब शाहनवाज ने महिला को जिप्सी से उतार लिया, तो इस बात पर उसकी पुलिसकर्मियों से कहासुनी हो गई। सड़क पर हंगामा बढ़ता देख जिप्सी में मौजूद पुलिसकर्मियों ने थाने से अन्य पुलिसकर्मियों को बुला लिया, जिसके बाद आधा दर्जन से अधिक पुलिसकर्मियों ने शाहनवाज की जमकर पिटाई कर दी। इसके बाद अस्पताल ले जाने की बजाय वह उसे थाने ले गए, जहां तबीयत बिगड़ने के बाद उसने दम तोड़ दिया।