अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) के एक ड्राइवर को 34 साल बाद आरोपों से मुक्त कर दिया है। अदालत ने ड्राइवर की बर्खास्तगी को खारिज करते हुए औद्योगिक ट्रिब्यूनल के फैसले को बरकरार रखा। हाईकोर्ट ने कहा कि जांच प्रक्रिया में ड्राइवर को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर नहीं दिया गया था।
न्यायमूर्ति अमित महाजन ने अपने फैसले में औद्योगिक ट्रिब्यूनल के निर्णय को तर्कसंगत बताया। अदालत ने कहा कि इसमें कोई विसंगति या त्रुटि नहीं है। डीटीसी में ड्राइवर श्याम सुंदर ने 7 मई 1992 को बिना अनुमति के ड्यूटी छोड़ दी थी। इसके बाद 18 जून 1992 को उन्हें अनधिकृत अनुपस्थिति के लिए आरोप पत्र जारी किया गया। ड्राइवर ने जवाब में बताया कि उनकी पत्नी गंभीर रूप से बीमार थी। उन्होंने एक सहकर्मी के माध्यम से छुट्टी के आवेदन भी भेजे थे। जांच अधिकारी ने ड्राइवर के जवाब को आरोप स्वीकार करने के आधार पर खारिज कर दिया। बिना किसी और सबूत या गवाही के जांच समाप्त कर दी गई। 17 मई 1993 को ड्राइवर को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि ड्राइवर ने अनुपस्थिति स्वीकार की थी। लेकिन उसने पत्नी की बीमारी का वाजिब कारण भी बताया था। अदालत ने कहा कि इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जांच अधिकारी ने ड्राइवर के जवाब के बावजूद आरोप स्वीकार मान लिए थे। यह बिना किसी और सबूत के किया गया था। 27 अप्रैल 2001 के ट्रिब्यूनल के आदेश को डीटीसी ने कभी चुनौती नहीं दी।
यह मामला 1992 से चल रहा था। ड्राइवर श्याम सुंदर 30 अप्रैल 2003 को ही सेवानिवृत्ति की आयु पूरी कर चुके थे। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सेवानिवृत्ति के बाद धारा 17-बी के तहत कोई राहत नहीं दी जा सकती। इस दोषमुक्ति के बावजूद ड्राइवर को कोई वित्तीय या अन्य लाभ नहीं मिल पाएगा।