ये ऐसा प्रोफेशन है जहां आप लगातार सुर्खियों में रहते हैं और लोगों से घिरे रहते हैं। चुनाव आते ही आपकी मांग बढ़ जाती है। अपने प्रतिद्वंदी को हराने के लिए आप जी-जान लगा देते हैं।
चुनाव में किसी की जीत होती है तो कोई हारता भी है। लेकिन चुनाव के बाद आपका यही संघर्ष आपके आगे बढ़ने के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट बन जाए तो आप क्या करेंगे।
ये कोई कहानी नहीं हकीकत है। टीओआई ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के ऐसे ही छात्रनेताओं की खबर लेने की कोशिश की जो डूसू के चुनाव लड़े तो लेकिन, हार गए।
हार चुके और अब सुर्खियों से दूर इन नेताओं के जीवन की सच्चाई उन युवाओं की आंख खोल सकती है जो राजनीति को अपना कैरियर बनाना चाहते हैं।
छात्रनेताओं के नौकरी न पाने के कारण
असल में छात्र जीवन तक तो स्टूडेंट पॉलिटिक्स से उनका गुजारा हो जाता है लेकिन पढ़ाई के बाद जब कैरियर चुनने का वक्त आता है तो पता चलता है कि सरकारी से लेकर प्राइवेट तक सभी नौकरियों में उन्हें अयोग्य करार दे दिया जाता है।
छात्रनेताओं के नौकरी न पाने के कई कारण हैं...
(1) राजनीति में सक्रिय होने की वजह से उनका अकादमिक रिकॉर्ड भी बेहतर नहीं होता क्योंकि उनकी अटेंडेंस आमतौर पर कम ही रहती है।
(2) आंदोलनों के दौरान उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ता है और उन पर कानूनों के उल्लंघन के केस भी दर्ज होते हैं। ऐसे में कोई भी कंपनी इन्हें लेने से परहेज करती है।
दो बार नहीं हुआ सलेक्शन
(3) एक छात्र नेता सेना की लिखित परीक्षा दो बार पास करता है लेकिन वह इंटरव्यू में सलेक्ट नहीं हो पाता। अपने एक दोस्त के कहने पर तीसरी बार अपनी सीवी में इस बात का जिक्र नहीं करता कि वह छात्र नेता भी रहा था। इस बार वह सलेक्ट हो जाता है।
(4) एक पुरा छात्रनेता अक्षय लकरा का कहना है कि जहां प्राइवेट नौकरी में आप अपने पुअर एकेडमिक रिकॉर्ड के चलते चुने जाने से रह जाते हैं, वहीं सरकारी नौकरी में आपको इसलिए नहीं लिया जाता क्योंकि वहां आम मान्यता है कि नेता दबंग होते हैं और किसी का आदेश नहीं मानते।
(5) ऐसे ही एक छात्र नेता साकेत बहुगुणा का कहना है कि कंपनियों में इसलिए भी छात्र नेताओं को नहीं लिया जात क्योंकि उन्हें लगता है कि इनके संबंध अराजक तत्वों से होते हैं। गलती से अगर बॉस ने इन्हें कुछ कह दिया तो ऑफिस के बाहर नुकसान उठाना पड़ सकता है।
राजनीति को प्रोफेशन बनाना गलत है?
गुड़गांव में एक एचआर कंपनी चलाने वाले अंकुश का कहना है कि नेताओं के न चुने जाने का एक कारण यह भी है कि इंटरव्यू के दौरान वह यही बता सकते हैं कि वह कॉलेज के सेक्रेटरी या प्रेसिडेंट थे।
इसके अलावा उनके पास बताने के लिए कुछ खास नहीं होता। ऐसे में किसी कंपनी को उनकी अन्य योग्यताओं का पता नहीं चल पाता।
हालांकि हायरिंग कंपनियों का यह भी कहना है कि हम उम्मीदवार को उसकी योग्यता के आधार पर ही चुनते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि पहले वह क्या था।
एक पीआर फर्म के डायरेक्टर पवन होरा का कहना है कि मैं खुद स्टूडेंट लीडर था लेकिन नौकरी पाने में कभी भी कोई परेशानी नहीं हुई।
राजनीति देखने में जितनी आकर्षक है उससे दूर होने के बाद वह उतनी ही बदरंग लगने लगती है। तो क्या राजनीति को प्रोफेशन बनाना गलत है?
(एहतियातन कुछ नाम बदल दिए गए हैं)
साभार: टीओआई